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हईं हम त अइसन डहरिया के राही - जगन्नाथ

हईं हम त अइसन डहरिया के राही।
मिल डेगे-डेगे प हमके तबाही।।
रहल दिन-रात जे डहरिया में साथे,
लुटाइलि उमिरिया भरल ओही हाथे ;
चदरिया रहल साफ हरमेस मन के,
मिल दाग बाकिर कहीं कतना माथे।
रहल हाल ईहे उमिरिया के हरदम,
कि जेही मिल ऊ करत गइल घाही।
मिल डेगे-डेगे प हमके तबाही।।

कहारन का असरा प जिनगी के डोली,
बढ़त जा रहलि बा सुनत सभ ठिठोली ;
कहे के त बाटे सभे मीत आपन,
सुनल केहू बाकिर ना हियरा के बोली।
भेंटाइल ना सिसिकी के ददखाह केहू,
हँसी के भले मिललें दाही-प-दाही।
मिल डेगे-डेगे प हमके तबाही।।

बचल पास अपना बा बस ईहे थाती
जिनिगिया के दियरा, दरदिया के बाती ;
लुटवलीं बहुत बेर अँसुअन के मोती,
छुटलि नाहीं तबहूँ दरदिया से छाती ;
लेलस लूट सब कुछ तबो ई बेदरदी,
जमाना अबहुओं लगवले बा टाही।
मिल डेगे-डेगे प हमके तबाही।।
हईं हम त अइसन डहरिया के राही।
मिल डेगे-डेगे प हमके तबाही।।
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लेखक परिचय:-

नाम: जगन्नाथ
जनम: 15 जनवरी 1934
जनम अस्थान: कुकड़ा, बक्सर, बिहार
परमुख रचना: पाँख सतरंगी, लर मोतिन के
अंक - 90 (26 जुलाई 2016)

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