संपादकीय

कंकाल के रहस्य - 3 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"


गमछा पाड़े कुछही दूर वापस भइल रहन कि उनका लागल ऊ कुछ भुला गइल बाड़े. पाड़ेजी वापस पलट के ओहि जगह जाये लगले त ठलुआ अउरी हवलदार भी उनका पीछे जाये लागल पर पाड़ेजी ऊ दुनो लोग के बहरी निकल के पान वाला दुकान पर खड़ा रहे के निर्देश दे दिहले. जेकरा बाद ऊ दुनो लोग जेहर से आइल रहे ओहरे से वापस हो गइल. जबकि पाड़ेजी वापस पत्थर वाला जगह पर पहुँच गइले आ उहाँ रुक के चारो तरफ नजर घुमवले त उनका टूटल चूड़ी के टुकड़ा नजर आइल, जेकरा के उठवला क बाद पाड़ेजी दुसरा तरफ से झाड़ हटा के चले लगले. पाड़ेजी जवन रस्ता में चलत रहुवे ओकरा में झाड़ जरुर रहे बाकि झाड़ के हटवला से साफ लउकत रहे कि केहु न केहु ओह रास्ता के प्रयोग जरुर करत होई. काहे से कि झाड़ हटवला पर पगडंडी नीयर रास्ता साफे लउकत रहे. तनिका दूर गईला पर झाड़ खतम हो गइल आ सिर्फ पगडंडी रह गइल. जेकरा पर चलत पाड़ेजी एगो पुरान बँगला के पीछे से होत के मेन सड़क पर आ गइले. अपना दहिना तरफ देखला पर उनके २ फर्लांग के दूरी पर मोड़ नजर आइल जहँवा उनके दुकान पर हवलदार अउर ठलुआ साफ लउकत रहे. पाड़ेजी जवन बँगला के पिछवाड़ा होत सामने सड़क पर आइल रहन ओकरा सामने एगो जनरल मर्चेन्ट के दुकान रहे आ ओह बँगला से मोड़ तक के बीच में सड़क के दुनो तरफ मिला के ५ से ६ बँगला अउरी लउकत रहे. अधिकारी लोग के आवास होखला के कारण अउरी दुपहरिया होखला के कारण रस्ता में चहल पहल ना रहे. सिर्फ इक्का दुक्का लोग ही पैदल चाहे साईकिल पर एहर ओहर जात नजर आवत रहे. पाड़ेजी ओह तरफ चल पड़ले आ थोड़के देरी में ठलुआ अउरी हवलदार तक पहुँच गइले.
'चलऽ जा भाई लोग, ईहाँ के काम खतम हो गइल. भाई रामदीन...'  
'गमछाजी...'
'तोहार बहुत बहत धन्यवाद. अब तू जा. हमनी के तनी एस. पी. साहब से मिल के आइल जाई. सिंह साहब से कह दीहऽ कि ऊ हमनी के इंतजार करस.'
'जी बहुत अच्छा.' कह के हवलदार रामदीन अपना स्कूटर से वापस चल गइल. जेकरा बाद पाड़ेजी ठलुआ के देखले त ओकरा के अपने तरफ देखत पवले.
'अइसे हमरा के बनबिलार नीयर का देखत बाड़ऽ? तोहरा नइखे चले के बा का?'.
'लेकिन गुरु?' ठलुआ कुछ पूछे चहलस त पाड़ेजी बीचे में टोक दिहले..
'आपन सवाल जवाब घरे चलके करीहऽ. लेकिन तनिका रुके के पड़ी. हम जरा पान वाला से कुछ पुछताछ कर लीं.' कह के पाड़ेजी पान वाला दुकान पर जाके ओकरा से कुछ पुछ लगले. पाड़ेजी का पूछत बाड़े आ पान वाला का जवाब देत बा ठलुआ के कुछ ना पता चलल. पूछताछ कइला के बाद पाड़ेजी ठलुआ के साथे एस.पी. साहब के आफिस के तरफ चल पड़ले.
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एस. पी. साहब के चेहरा से लागत रहे कि सामने बइठल पाड़ेजी उनका के आज के सारा कहानी बता देले बाड़े. जेकरा के सुन के ऊ कुछ सोच मे पड़ गइल बाड़न. एस. पी. साहब सोचे के मुद्रा खतम करे खातिर एगो लमहर साँस लिहले फेर पाड़ेजी से सवाल करे लगले.
'गमछा पाड़े एकर मतलब त ई भी भयल कि हमरे विभाग वाले नाकारा हउअन सब?'
'एस. पी साहब, ई का कह रहल बानी रउआ? कबो कबो बिलार के नीचे से भी मूसा बच के निकल भागेला. एकरा से ई कहाँ साबित होखी कि मूस बड़ हो गइल. पुलिस के जँहवा कंकाल मिलल वइजा से मेन घटना के जगह के बीच में बस झाड़ ही झाड़ बा. उ त हमार ध्यान ओह चीज पर चल गइल जवन कि ओह जगह के पहचान करे खातिर धूहा जस बाँस में हड़िया लगा के खाड़ कइल बा. वइसहीं जइसे कि अनाज के खेत में चिड़िया लोग के उड़ावे खातिर लागल रहेला. हमरा के ओह जगह पर उ चीज अचम्भा लागल अउर हम उहाँ पहुँच गइलीं.'
पाड़ेजी एस. पी. साहब के हताशा के खतम करे खातिर सही बात बतवले त ऊ उनकरा के अचम्भा से देखे लगले. उनका चेहरा से लागत रहे कि उनके ई बात के मलाल बा कि पुलिस के अइसन अचम्भा काहे ना लउकल.
'अउर अब आप ई कहे चाहत हउआ कि कंकाल एही इलाका के कउनो औरत के चाहे काम करे वाली औरत में से केहु के हो सकेला.' एस.पी. साहब सवाल कइले.
'नाऽ. हम अइसन कुछ नईखीं कहत. काहे से अइसने होखित त अबले कंकाल के पहचान जरुर हो गइल रहित. लेकिन उ जगह एह इलाका के कुछ नाजायज प्रेमी प्रेमिका लोग के अड्डा जरुर बा. अउरी ओहि मे केहु एक हमनी के ई केस के तह तक पहुँचावे में मदद जरुर करी.'
'हम ओह आदमी के खोज दु दिन में करा देब...'
नाही एस. पी. साहब. सबकर आपन व्यक्तिगत जिन्दगी बा. हम ना चाहेब कि नाहक ई इलाके के कउनो शरीफ आदमी चाहे औरत के बदनामी हो.'
'फिर आप हमसे का चाहत हउआ?' पाड़ेजी के जवाब पर एस. पी. साहब सवाल कइले...
'ई ठलुआ बा. देखे में बेवकूफ लेकिन दिमाग बड़ा तेज चलेला. पाड़ेजी ठलुआ के तरफ ईशारा कर के एस. पी. साहब से ओकर परिचय करवले आ फिर कहे लगले.. काल से ई एह इलाका में चाहे भिखारी बन के चाहे पगला बन के ओ आदमी के खोज करी. बस आपके एकरा के नजरअंदाज करे के बा.'
'जरुर.' एस. पी. साहब के चेहरा पर हँसी आ गइल.
'तब हमरा के अब इजाजत दीं. फेर भेंट होखी.' एस. पी. साहब के बात सुन के पाड़ेजी खड़ा होत कहले त एस. पी. साहब उनका के रोके चहले.
'अइसे कइसे? चाय पानी करे बिना थोड़े जाये देब.'
'आप से चाय पानी ना पूरा भोजन पार्टी लेब. बाकि ई मामला पर से परदा उठवला क बाद. अबगे इजाजत दीं. केहु इंतजार करत होखी.'
कह के पाड़ेजी ठलुआ के साथे बहरी चल गइले. एस.पी. साहब के चेहरा से लागत रहे कि ऊ पाड़ेजी के दिमाग के लोहा मान लेले बाड़े. पर का आपके लागत बा कि पाड़ेजी एह मामला के तह तक पहुँच पईहें? का ठलुआ पहिलका बार के तरह एह बार भी अपना काम में सफल हो पाई? काहे से कि पहिलका बार ओकरा हाथ में कुछ तस्वीर अउरी एगो दुकान के रसीद भी रहे पर एह बार ऊ खाली हाथ रही. ऊ भी आपन वेश बदल के. का ठलुआ अपना काम में सफल होखी?
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"
अंक - 88 (12  जुलाई 2016)

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