संपादकीय

कंकाल के रहस्य - 4 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

पाड़ेजी अउरी ठलुआ सिगरा थाना में सिंह साहब के सामने बइठल बा लोग. पाड़ेजी एगो कागज पर लिखल कुछ पढ़त बाड़न जेकरा के पढ़ला के बाद ऊ कागज टेबुल पर राख के सिंह साहब से मुखातिब भइले.
'सिंह साहब अगर एह लिस्ट से कंकाल मामला मे कउनो एक नाम चुने के होत तऽ रउआ का करतीं? '
पाड़ेजी सवाल कइला क बाद सिंह साहब का ओर देखे लगले आ सिंह साहब के चेहरा से लागत रहे कि उनका पास कउनो जवाब नइखे पर कुछ ना कुछ तऽ कहही के रहे.
'गमछा जी, बड़ा मुश्किल हव आपके सवाल क जवाब. खुद सोचीं गुमशुदा औरतन के लिस्ट में से के के चुनल जाव. ?'
सिंह साहब के सवाल सुन के गमछा पाड़े मुस्करा दिहले आ एक बार फेर लिस्ट के ध्यान से देखे लगले. ठलुआ उनका के गौर से देखत रहे आ कुछ अइसने हाल सिंह साहब के भी रहे. एह बीच एक हवलदार टेबल पर सबकरा खातिर चाय राख गइल. पाड़ेजी लिस्ट देखला के बाद ओकरा के टेबल पर रख के कुछ सोचले फिर चाय उठा के एक घूँट पी के लम्बा साँस लेत कहले. .
'हम एकरा में से छँटनी करके ओह रिपोर्ट पर काम करतीं जवन हमरा खातिर ज्यादा फायदा वाला होखत. आ ओह हिसाब से लिस्ट में से सात, नव अउरी पन्दरह नम्बर वाला नाम हमरा खातिर ज्यादा काम के बा. आ हमरा के एही तीन औरतन के गुमशुदगी के पूरा रिपोर्ट चाहीं. '
एतना कहला के बाद पाड़ेजी आराम से चाय पिये लगले आ ठलुओ से चाय पिये के कह दिहले. जबकि सिंह साहब उनका के आश्चर्य से देखे के साथ साथ लिस्ट के उठा के खुद पढ़े लगले. जबतक सिंह साहब लिस्ट में से पाड़ेजी के मतलब वाला नाम के पढ़ के कुछ समझ पवते पाड़ेजी चाय पी चुकल रहन. लिस्ट पर गौर कइला के बाद सिंह साहब पाड़ेजी से कुछ पूछे चाहत रहन बाकि पाड़ेजी उनका के चुप करावत कहले. .
'एह समय राउर कवनो सवाल जवाब के देबे खातिर हमरा पास शब्द नइखे. बस जवन कहत बानी ओकर व्यवस्था बना दीं. बकिया बात बाद में हो जाई. . ' कहके पाड़ेजी खड़ा हो गइले साथे साथे ठलुआ भी खड़ा हो गइल आ एकरा पहिले कि सिंह साहब कुछ कहते चाहे पुछते पाड़ेजी ठलुआ के साथे उनका के आश्चर्य मे छोड़ के बहरी चल गइले.
पाड़ेजी के गइला क बाद सिंह साहब फोन पर कुछ निर्देश देबे लगले जेकरा से बेखबर पाड़ेजी ठलुआ के साथे वापस घरे जात रहन. चलते चलत ठलुआ उनका से सवाल कइलस ..
' गुरु, हमके तऽ बता दऽ कि ५० रिपोर्ट में से आप केवल तीने नाम काहे चुनलऽ?'
'काहे से कि हमरा हिसाब से ओही तीन रिपोर्ट में से कउनो एगो नाम हमरा काम के होखे के चाहीं. '
'लेकिन?' ठलुआ के पाड़ेजी के जवाब से संतुष्टि ना मिलल, से फेर सवाल करे चहलस बाकि एह बार पाड़ेजी ओकरा के बीचे में टोक दिहले. .
'बुरबके हऊअऽ! अरे पोस्टमार्टम के रिपोर्ट के हिसाब से मरत समय कंकाल के जवन उमिर होखे चाही आ कंकाल के पास से मिलल सामान से हम ओह औरत के बारे में जवन इलाका के होखे के अन्दाजा लगवले बानी ओह खाका-बाका में उहे तीन गो फाइल सही बइठत बा. वइसे एक बात बता देत बानी अउर ऊ कि यदि एह बार तू आपन काम सही तरह से कर गइलऽ त बूझ लिहऽ हम लोग के शायद फाइल कऽ सहारा लेबही के ना पड़ी. बूझ गइलऽ कि ना?' पाड़ेजी अपना घर के बहरी आपन मोटर साईकिल रोकत कहले.
मोटरसायकिल खड़ा करवावे में ठलुओ उनकर मदद कइलस जेकरा बाद ऊ ठलुआ के पईसा देके एगो खास दुकानि से समोसा लियावे के कहले. ठलुआ समोसा ले आवे चल गइल आ पाड़ेजी घर ले अंदर चल गइले. तनिका देर बाद पाड़ेजी अउरी ठलुआ समोसा का नास्ता के साथे चाय के चुस्की लेत रहे लोग अउरी पाड़ेजी ठलुआ के समझावत रहन कि ओकरा के का काम करे के बा.
'तोहरा बस ई ध्यान राखे के बा कि कुछुओ हो जाये ओह इलाका के बड़ आदमी लोग क घरे के मेहरारुअन चाहे लइकिन लोग के नाम सामने ना आये. तोहरा सिर्फ ओह आदमी पर नजर रखे के बा जे ओह तरफ जात बा. खास कर के ओह आदमी पर जे मजदूर टाईप औरतन क साथे ओहर जा रहल बा. '
'जी गुरु.' सब सुनला क बाद ठलुआ हामी भरलस.
'अउर एक बात. चाहे कुछ हो जाये तोहरा ओह जगहा से हटे के नईखे. यदि केहु के पीछा करे के होखे त फोन से हई नम्बर दबवले रहीहऽ.' कहत पाड़ेजी ओकरा के मोबाइल पर १ नम्बर वाला बटन के देखवले फिर कहले.. 'आ तनिका देर खातिर जेकर पीछा करे के बा ओकरा साथे कवनो बहाना से उलझ जइहऽ. '
'जी गुरु.'
'का जी गुरु?' पाड़ेजी सवाल कइले. .
'ओसे उलझ जाब.'
'पर जनबऽ कईसे कि एह आदमी के पीछा ना करे के बा?'
'ऊ आदमी के इलाका कऽ नाही होवे के चाही'
'बढ़िया. अउरी?' पाड़ेजी ठलुआ के जवाब सुन के खुशी-खुशी दुसर सवाल कइले.
'आदमी कहीं के हो मगर बहरी अलंग के औरतन क साथे ओहर जात हो अउर हम ओके ना पहिचानत होई कि ऊ कहाँ क हव.'
'अउरी जे ऊ तोहरा जानकरी में हो कि कहाँ के बा लेकिन बहरी अउरी ओह इलाका के औरतन के साथे ओहर जात होखे तब?'
'तब हमके आपके मिस काल करे के हव. '
'बहुत बढ़िया. एतना ध्यान रहे कि कवनो सूरत में तोहार मोबाइल तोहरे झोला से बहरी न आवे. '
'जी.'
'एह काम में दु दिन भी लग सकताऽ आ दू हफ्ता भी. लेकिन चिन्ता मत करीहऽ. तोहरा पास खाना पीना सब समय-समय पर केहु न केहु बहाने पहुचत रही. लेकिन इलाका में केहु के एहसास भी ना हो कि तू पागल चाहे भिखारी नइख.'
'गुरु ओकर त चिन्ते मत करऽ. बाकि खाना पीना पहूची कईसे? अगर ईहो बता देताऽ त?'
'हम आईं, चाहे कवनो हवलदार. जेकरा हाथ में गुलाब के फुल के गुलदस्ता के साथे साथे प्लास्टिक के थैला भी हो. ओकरा से उलझ जइह. तोहरा खाना मिल जाई. '
'जी. '
' तोहरा काल्हुवे से आपन काम शुरु कर देबे के बा.'
'जरुर गुरु. अब हमके इजाजत दऽ. हमके बाजार से कुछ चीज खरीदे के हव.'
'ठीक बा. ' कहत पाड़ेजी ओकरा के कुछ रुपया भी दिहले जेके लेके ठलुआ पाड़ेजी के पैर छू के आशीर्वाद लिहलस आ अपना मिशन पर रवाना हो गइल. पाड़ेजी ओकरा के जात देखत रहन आ उनका चेहरा से लागत रहे कि उनका ठलुआ से सफलता पर पूरा भरोसा बा.
पर का ठलुआ पाड़ेजी के कसौटी पर खरा उतरी? का सचमुच पाड़ेजी ठलुआ के मदद से ई केस सुलझा पावे मे सफल होइहें? पढ़ीं जा अगिला भाग में. .
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
अंक - 89 (19 जुलाई 2016)

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