संपादकीय

कंकाल के रहस्य - 2 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

'एगो तीर निशाना पर का लाग गइल, रउआ पूरा अर्जुने बने खातिर अफनाये लगलीं! बाकी कह देत बानी ईहँवा राउर दाल ना गली.' हाथ में चाय के ट्रे लेके पंडिताईन पाड़ेजी के आफिस में घुसत कहली आ टेबुल क पँजरा पहुँच के चाय के ट्रे रख दिहली. पाड़ेजी अउरी ठलूआ उहाँ पहिलहीं से बइठल रहे लोग. पंडिताइन जइसे ट्रे के टेबुल पर रखली ठलुआ कप के चाय दुनो जाना के बारी बारी से पकड़ा के चाय के आपन कप उठा लिहलस. पंडिताइन के बात से साफ लागत रहे कि पुलिस थाना वाला किस्सा उनका मालूम हो गइल बा.
'मलकिन कउनो जरुरी बा कि तोहार टेपरिकार्डर हमेशा चालू रहे?'
'हमार टेपरिकार्डर बा आ रउआ त जइसे स्टिरियो बजावत बानी! हमरा का? करीं अपना मन के. बाद में हमरा लगे मत आयेब!' एतना कह के पंडिताइन बहरी जाये लगली. जात जात दरवाजा पर रुक के ठलुआ से कहली 'का हो रसोइ में अइबऽ कि तोहरो एकलव्य बने के बा?'
इ बात सुन के ठलुआ कुछ कहीत ओकरा पहिले पाड़ेजीए बोल पड़लें, 'पंडिताइन रसोई खातिर अब ठलुआ के भुला जा. काल्हु से तोहरा खातिर एगो महरी के इंतजाम कर दिहले बानी. काहे से कि हम ना चाहेब कि तू कहीं भी काम के बीच में ठलुआ के रसोई में खींच के ले जा. आखिर हमरो इज्जत के सवाल बा.'
एतना सुन के पंडिताइन कुछ कहे चहली बाकि कह ना पइली. शायद उनहु के ई बात मालूम रहे कि उगता सुरुज के सलाम कइल जाला. आ चाहे जो हो, फिलहाल त पाड़ेजी के मोछ पर ज्यादा ताव बा. बाकि पाड़ेजी के बात सुन के जाये से पहिले अइसन मुँह बनावे मे ना हिचकली जेकरा के देख के लागे कि मुहँ के स्वाद बहुत कड़ुआ हो गइल बा. पंडिताइन के जाये के बाद पाड़ेजी ठलुआ के समझावे में बिजी हो गइले.
'हाँ, तऽ हम का कहत रहनीं ह?'
'यही कि केस त बहुत तगड़ा हव लेकिन यदि पुलिस थाना से सही जानकारी मिल गइल त ईहो मामिला सझूरावत देर नाही लागी.'
'सही जवाब. लेकिन बबुआ, पुलिस के जवाब के इंतजार में हम खाली हाथ बइठे वाला नाही बानी. चलऽ, चलके घटना वाला जगह देखल जाव. का पता, पंडिताइन के सोच से हमनी के हाथ फेर बिलाई के भागे छींका टूटे वाली बात हो जाव.'
एतना कहला के बाद पाड़ेजी चाय के आखिरी घूँट पी के खाड़ हो गइले. देखा देखी ठलुओ खड़ा हो गइल. बाकि ओकरा मन में एगो सवाल रहे जेकरा खातिर ऊ पाड़ेजी के टोक दिहलस.
'लेकिन गुरु ?'
'अइसे भकुआ के देखे के दरकार नइखे. सिंह साहब से बात हो गइल बा. घटना वाला जगह पर एगो सिपाही पहुँच चुकल होई.'
कहके पाड़ेजी बहरी चल दिहले आ पाछा पाछा ठलुओ चल पड़ल.
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उधर इन्सपेक्टर सिंह फोन पर केहु के निर्देश देत रहन.
'हम कुछ ना जानत हई. हमके एक हफ्ता के भीतर ४० किलोमीटर दायरा में के हर थाना के ऊ रिपोर्ट चाही जेम्मे ३० से ३५ साल के अइसन मेहरारू के गुम होवे कऽ रिपोर्ट दर्ज हो जवन शहर में जाके काम करत हो या कउनो कारण से ओकर शहर खासकर के बनारस बराबर आना जाना हो.' दुसरा तरफ के आवाज सुनला के बाद सिंह साहब फिर कहले ' अउर हमके शहर के हर थाना कऽ भी अइसन रिपोर्ट चाही जेम्मे कउनो काम वाली बाई के कऊनो भी कारन से गुम होवे के बात दर्ज हो. खास करके शहर के बहरी इलाका क.'
दुसरा तरफ से फिर कुछ कहल गइल जेकरा के सुनला के बाद सिंह साहब एतना कहले कि एक दु दिन के देरी हो चली लेकिन एतना ध्यान देले रहे कि ई केस में एस.पी. साहब खुद दिलचस्पी लेत हउअन.'
एतना कहला के बाद सिंह साहब फोन रख के एगो हवलदार के बोलवले अउर ओकरा के कंकाल वाला घटनास्थल पर जाये के आदेश दिहले. जेकरा बाद हवलदार अपना काम पर चल गइल. सिंह साहब लम्बा साँस लेत कुर्सी पर पसर गइले. उनका सामने टेबुल पर पाड़ेजी के लिखल चिट राखल रहुवे. जेकरा के ऊ एक बार फिर से उठा के पढ़ले अउरी निश्चिन्त हो गइले. चिट में उहे लिखल रहे जेकरा के पूरा करे खातिर पाड़ेजी फोन पर निर्देश देत रहुवन. समझे वाला उनका चेहरा के भाव देख के समझ सकत रहे कि ऊ परेशान बाड़े. परेशानी इ खातिर भी हो सकेला कि उनका दिमाग में पाड़ेजी वाला बात काहे ना आइल अउरी परेशानी इ बात के भी हो सकेला कि पाड़ेजी के दिमाग में ई बात आइल त ई कइसे आइल. आ ईहो बात के हो सकेला कि का पाड़ेजी के दिमाग महादेव बाबू वाला केस के तरह एह बार भी सफल होइ?
पाड़ेजी ठलुआ के साथे घटना वाला जगह पहुँचले त थाना वाला हवलदार उनही क इंतजार करत रहुवे. जब ऊ पाड़ेजी के अभिवादन कइलस त पाड़ेजी भी ओकर जवाब दिहले आ फिर सवाल कइले -
' का हो रामदीन सब ठीक बा नू ?'
'जी पाड़ेजी.'
'भाई, नामे लेबे के बा त पूरा नाम लिहल करऽ. ना त खाली गमछाजी भी चली. का बा कि बाबा के टाइम से ही पूरा नाम सुने के आदत पड़ गइल बा. आ जब केहु गमछा बोलेला त हमरा भीतर भी एगो जोश आवेला कि कुछ कर के देखावे के बा.'
'जी.' बेचारा हवलदार एकरा से ज्यादा कुछ ना कह पइलस.
'खैर छोड़ऽ आ बतावऽ कि केने चले के बा?' ई सवाल करत के पाड़ेजी के निगाह चारो तरफ दउड़त रहे. बाकि कुछ घर के अलावा उनके एक तरफ पान के दुकान के साथ साथ वही से लागल चाय के दुकान के अलावा कुछ ना नजर आइल. सुनसान इलाका में हवलदार उनका के एगो घर के बगल से पिछवाड़े के तरफ ले गइल. जहाँ चारो तरफ झाड़ के अलावा दूर एगो गंदा से तालाब देखात रहे. तनिका अउर अन्दर गइला पर हवलदार उनका के ईंटा से घेरल जगह देखा के कहलस ‍-
'गमछा महाराज ईहँवे कंकाल मिलल रहे.'
'भाई रामदीन बड़ा जल्दी हमार बात बूझ गइलऽ.' एतना कहला के बाद पाड़ेजी सब तरफ देखे लगले. बाकि कुछ खास ना देखाई पड़ल. पर पता ना काहे ऊ झाड़ के हवलदार के हाथ के डंडा से हटावत एक तरफ चल पड़ले आ करीब एक फर्लांग गईला के बाद एक जगह खाड़ हो गइले. उहँवा के जगह जरा साफ सुथरा लागत रहे. आ १० १० फीट चारो तरफ अइसन लागत रहे कि ईहँवा केहु ना केहु जरुर आवेला. एक तरफ पत्थर के चबूतरा जईसन कुछ रहे जेकरा पर एक आदमी आराम से लेट सके. चबूतरा के गौर से देखला पर पाड़ेजी के एक कोना में कुछ देखाइ पड़ल. जेकरा बाद ऊ उहँवा गइले आ ओह चीज के निकाल के देखले त उनका चेहरा पर हँसी अउर खुशी दुनो छा गइल. पाड़ेजी ऊ चीज के जेबा में रखले अउरी ओकरा बाद उ जगह के ठीक से देखला के बाद पलटले आ कहले -
'अब चले के दरकार बा. ईहँवा जवन चीज खातिर आइल रहीं ओकरा से ज्यादा मिल गइल.'
रामदीन के अलावा ठलुओ उनका के गौर से देखे लागल. बाकि पाड़ेजी दुनो के तरफ ध्यान देले बिना जेहर से आइल रहन ओहरे से वापस हो गइले. देखा देखी ऊ दुनो भी पाछा पाछा चल पड़ले.
आखिर कवना चीज खातिर पाड़ेजी आइल रहन आ उनका कवन चीज मिल गईल? का ऊ चीज पाड़ेजी के ए केस पर भी सफल होखे में मदद करी?
दूसरका भाग खतम..................
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"










अंक - 87 (5 जुलाई 2016)

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