संपादकीय

साठ बरिस के भइया - मनोज भावुक

भउजी सोरह के बाड़ी आ साठ बरिस के भइया
बाज के चोंच में देखीं अंटकल बिया एक गौरइया

भिखमंगा जी बेंच के बेटी, दारू पीके कहलें
बाबू बड़ा ना भइया साला सबसे बड़ा रूपइया

“पराम्ब्यूलेटर*” में घूमत बाड़े अब डैडी के सन
ऊ का जनिहें का होला ई “पिठइयां अउर कन्हइया”

पूजा में भोंपू बाजत बा “दिल देबू कि ना हो”
और बीच में जय जयकारा “जय सुरसती मइया”

मत पूछीं हमरा से कि हम कब से भटकत बानी
हमरा त लागत बाटे इ जिनगी भूलभुलइया

जब तन के छू के गुजरेला घाव करेला टभ टभ
हमरा अंदर के पीड़ा के जानेला पुरवइया

ससुरारी के मधुवन में हर ग्वालन सुंदर लागे
सरहज लागे सोनपरी आ साली सोनचिरइया

अब त सोनचिरइये जाल बिछावे, फंसे बहेलिया
लोग अनेरे भावुक के बदनाम करेला भईया

*पराम्ब्यूलेटर- (Perambulator=pram) – बच्चों को बैठाकर घुमाने की हल्की छोटी गाड़ी
----------------------------
अंक - 83 (7 जून 2016)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.