संपादकीय

मासन में पूसे बदमास - आचार्य महेन्द्र शास्त्री

मूस बनवलस पापी पूस। 
पाईं कहाँ रजाई धूस॥
दुनियाँ भर से गरमी गइल। 
हाँथ-गोड़ सब सन्न भइल
सूरज तक ले आज सेराइल। 
का होखो घामों मेहराइल
किरिनो देर-देर से ऊगे। 
जाडे़ जानू साँझे डूबे

नीममन लागे लागल आगे। 
बोरसी चाहीं घर-घर आगे
पानी में का आग लुकाइल। 
ओमें धूआँ-गरमी आइल
छोटे दिन सेह किचराइल। 
भोर होते साँझे बुझाइल
चन खानी सूरूज सीतल। 
जेठ के ऊ गरमी बीतल

जाड़ कातिक में जनमेला। 
अगहन लरिकाई खेलेला
पूस जवानी हाड़ कँपावे। 
माघ बुढ़ापा दाँत हिलावे
जब-जब दिनवाँ-रतिया झपसे। 
तब-तब कहवाँ के ना कँपसे
कौआ केंकुरल गाँव-गाँव। 
कहवाँ गइल कावँ-कावँ

दिन उठला तक हूआँ-हूआँ।
सगरे जानू धुआँ-धुआँ
नदी पोखरा ताल काल। 
एक डुबुकिए देह हेवाल
पानी जानू दउरे काटे। 
भीड़ नइखे घाटे-घाटे
गगरा भरल उठाईले। 
सरि पर ना भभकाईले

खइला बाद नहइला आगे। 
काह दूनी जाड़ा जागे
अजो दादा ना नहाएव! 
हमहूँ बे नहैले खाएब
रोजो मंत्रस्नाने होता। 
कहियो-कहियो लागे गोता
चीनी खानी मीठ घाम। 
जे ना मीली दिहले दाम

घुसुके-घुसुके तब तक जाला।
साँझे पड़े लागल पाला
पला परल रहर जरल। 
ओसे चमके सरसो फरल
देख-देखके अइसन ओस। 
हावा भईल जाता होस
आधा माघे कम्मर काँधे। 
जाड़ रह जाला तब आधे

बाउर ना ह अगहन मास। 
मासन में पूसे बदमास
परब मद्धे खिचड़ी एगो। 
कबहूँ-कबहूँ सेहू नेगो
रोगे दूनू जाड़-जड़ैया। 
दूनू जानू जउँआँ भइया
रुई धूँई दुई दवाई। 
ना त रोगी मरिये जाई

पंथ पाई खिंचड़ी भभरी। 
पींड़ी पाई, छोड़ी लबरी
दुलमे कुल्ही करीब-करीब। 
जे उपराजे उहे गरीब
खिंचड़ी का दिन दहीं चिउरा। 
जेपर बाभन जाला बउरा
तनकी-तनकी तिलवा लाई। 
चिउरा पर के इहे मिठाई

पिंछलहरा ई रेल आइल। 
उतरे के पड़ गइल उँ घाइल
ओ बेरा केकरा के पाई। 
केकरा घरे कहवाँ जाई
ए बेआड़ा ई बेआर। 
नीमन व ऐसे तरुआर
माघे जाड़ ना मेघे जाड़। 
जब बेआर तब काँपे हाड़

सर-सर चले जानू साँपे। 
पतई खानी जियरा काँपे
नाक से जे चूए पानी। 
कहल नइखे जात जबानी
गोड़ चुराइल से ठेढु आअल। 
वा बेवाय से बड़ा दुखाइल
अँकड़ी गड़े काँटे खानी। 
याद पड़े लागल नानी

कनकनाव लात पर आँच। 
पीरा से मन गइल नाच
चलते-चलते लागल ठेस। 
कहीं जे भइल कलेस
रात बीतल बा हुहुआत। 
प्रान लेवे आइल प्रात
अंग-अंग में बीछी मारे। 
मर गइली पीड़ा का मारे

हाय अंगुरिया अँगरल का ई! 
ओह-ओह माई रे माई
जाड़ हाड़ में पइठ गइल। 
जाते नइखे बरठ गईल
चलनी हाँ व तीने माइल। 
बाकिर दादा बड़ा बुझाइल
एक दिनवाँ में राते-रात। 
खाए के बा भाते-भात

खाली पेटे बथे आँत। 
कँपकँप्पी से बोले दाँत
गोल-गाल हो लरिका सूतल। 
पाला लागल ओकर मूतल
अउरी बनल अबका करी। 
सउँसे रात, कबले मरीं
उठ-उठ के उटकेरीं कउर। 
ऊहो ससुर भउरे भउर
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लेखक परिचय: -

नाम: श्री आचार्य महेन्द्र शास्त्री जी 
जन्म: 16 अप्रैल 1901
निधन: 31 दिसंबर 1974
जनम अस्थान: रतनपुर, सारन (छपरा), बिहार
भोजपुरी औरी हिन्दी के साहित्यकार 
संस्कृत क बरिआर विद्वान
परमुख रचना: भकलोलवा, हिलोर, आज की आवाज, चोखपा
अंक - 83 (7 जून 2016)

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