संपादकीय

कहाँ गइल मोर गाँव रे - प्रभुनाथ सिंह

कहाँ गइल मोर गाँव रे!
बोल रे नेता ! बोल रे हाकिम ! कहाँ गइल मोर गाँव रे।
चॅवरा में छउकत दुपहरिया, बुढ़वा बर के छॉव रे॥

पनघट से रूसल पनिहारिन, धनक गइल सब गाछी।
गाय, बयल बिनु खूँटा रोवे चीक का घर में बाछी।
हरवाहा-चरवाहा के अब बूत रहल बा नाम रे।
कहाँ गइल मोर गाँव रे

चाचा, चाची, भइया, भउजी, भाई-बहिन के नाता।
चकवा-चकई, गुल्ली-डंडा, खेल भइल लापाता
सेहर-झूमर का आँगन में फिल्मी गीत के पॉव रे।
कहाँ गइल मोर गाँव रे

अब ना भोर के फाटक खोले, चुचुहिया के बोली
अब ना चिरई बाग में उतरे, साँझ के लेके डोली
गली-मोड़-चौराहा पर, लँगटे खड़ा तनाव रे।
कहाँ गइल मोर गाँव रे

खून के होली, दरद दिवाली, ईद ले नफरत आवे;
हर घर लंका-दहन चढ़ल बा, द्रौपदी कृष्ण बुलावे।
कुकुर-सिआर से बदतर जिनगी मिले ना कतूँ ठाँव रे
कहाँ गइल मोर गाँव रे
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प्रभुनाथ सिंह
अंक - 84 (14 जून 2016)

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