संपादकीय

जिनगी रोटी ना ह - केशव मोहन पाण्डेय

जिनगी
खाली तइयार रोटी ना ह
पानी ह
पिसान ह
रात के अन्हरिया पर
टहकत बिहान ह
कुदारी के बेंट पर
ठेहा लागल हाथ ह
कोड़ झोर कइला पर
सगरो बनत बात ह
बैलन के जोत ह
हर ह
पालो ह
इहे रीत चलेला
अथक सालो-सालो ह
जे दुर्गुण के चेखुर
नोच-नोच फेंकेला
शीत-घाम-बरखा में
अपना देहिया के सेंकेला
ज्ञान-संस्कार के
खाद-पानी डालेला
निरख-निरख गेंहुआ के
जान के जोगे पालेला
बनरी आ मोंथा के
उगहूँ ना देला जे
नेह के पानी सींच-सींच
गलावे सगरो ढेला जे
ऊहे मधु-मिसरी
रोटीया में पावेला
इस्सर-दलिद्दर के
सबके ऊ भावेला
ऊहे बुझेला असली
मन-से-मन के भाषा का,
ऊहे बुझेला
जिनगी के परिभाषा का?
त खेतवा बचाई,
बचाई किसान के
नाहीं त,
हहरे के परी सबके
एक चिटुकी पिसान के।।
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अंक - 83 (7 जून 2016)

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