संपादकीय

कंकाल के रहस्य - 1 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

सिगरा पुलिस थाना के दरोगा के कमरा में गमछा पाड़े, ठलुआ क साथे बइठल रहले आ उनका सामने इन्सपेक्टर सिंह अपना एगो अउर अफसर के साथ बइठल रहलन. सबकरा आगे चाय अउर नाश्ता राखल रहे, बाकिर खाली कप अउर प्लेट ई बात के गवाही देत रहन सऽ कि ऊहाँ नाश्ता के दौर खतम हो चुकल बा. सिंह साहब उनका के कुछ बतावत रहलन आ उनका साथे ठलुआ भी उनकर बात बड़ा ध्यान से सुनत रहे.
'मतलब आप ई कहत बानी कि आप लोग के एगो कंकाल मिलल बा जेकर पहिचान करे के चुनौती बा? सिंह साहब, ई त हम पहिला बार सुनत बानी कि पुलिस कंकाल के शिनाख्त खातिर एतना परेशान बिया. ना त हकीकत त ईहे बा नू कि हर महीना ना जाने केतना लाशन के लावारिस के रुप में ठिकाने लगावल जाला.'
सिंह साहब के बात सुन के पाड़ेजी सवाल कइले त पुलिस के दुनो अधिकारी एक दुसरा के देखे लागल. फिर इन्सपेक्टर सिंह जिम्मेदारी लेके सब बतावे शुरु कइले...
'गमछा जी, हम आपके बात समझ सकत हईं. लेकिन का हव कि ई कंकाल एस.पी. साहब का घर के पिछवाड़े पुरान तालाब क किनारे से बरामद भयल रहल. आ खुद एस. पीए. साहब ई कंकाल के बरामद कइलन.'
सिंह साहब के बात पाड़ेजी अउरी ठलुआ दुनो जाना बड़ा ध्यान से सुनत रहे लोग. एतना बात कह के सिंह साहब चुपा गइले त पाड़ेजी आपन सवाल कइले...
'सिंह साहब, हम ऊ कंकाल जरुर देखे चाहेब जेकरा वजह से आपके रात के नींद अउर दिन के चैन उड़ल बा.''जी जरुर लेकिन ओकरे खातिर हम लोग के बी. एच. यू. के मेडिकल कालेज चले के होई.' एतना कह के पाड़ेजी खाड़ भइले त सबे खाड़ हो गइल. अब तक के बातचीत के ध्यान से सुनत ठलुआ से ना रह गइल आ ऊ धीरे से पाड़ेजी के कान क पास जाके एगो सवाल करत बा...
'लेकिन गुरु, खाली कंकाल से केहु के पहिचान कइसे हो सकत हव ?'
ई बात सुन के पाड़ेजी ठलुआ के देखे लगले. उनकर चेहरा बतावत रहे कि ऊ ठलुआ के सवाल से पूरा सहमत बाड़े. शायद ई सवाल सिंह साहब भी सुन लिहले. एही से एकरा पहिले कि पाड़ेजी ठलुआ के कुछ जवाब देते चाहे पुलिस से कुछ सवाल करते, सिंह साहब खुद ही बोल पड़ले...
'हम लोग के पास कंकाल अउर कंकाल के पास से कुछ चीज भी मिलल हव जवन कि कंकाल के ही हव.'
एतना सुन के पाड़ेजी पहिले सिंह साहब के देखले फिर ठलुआ के देख के कहले...
'सुन लिहलऽ नू? एही के कहालाऽ डूबता के तिनका क सहारा. (फिर सिंह साहब से) भाई सिंह जी, फिर पहिले हमरा के उहे कुल चीजुइया देखा दीं.'
'जी जरुर.' एतना कह के सिंह साहब एगो हवालदार के बोला के केस नम्बर ५१३७ में बरामद सामान के ले आवे के आदेश दिहले. एक बार फेर से सब लोग बइठ जात बा. तनिके देर में हवलदार एगो पोटली लेके आ गइल, जेके खोलला क बाद सिंह साहब टेबल पर कुछ चूड़ी के टुकड़ा, गंदा सा साड़ी के किनारा के टुकड़ा, एगो चाँदी के करधनी, कड़ा, आ एगो चप्पल के जोड़ी रख दिहले. पाड़ेजी एह सब के बड़ा ध्यान से देखे लगले आ जब सब कुछ देख लिहले त लम्बा साँस लेत सिंह साहब से कहले...
'चलीं, एतना देखला के बाद ई त मालूम पड़त बा कि कंकाल औरत के बा. अब एतना अउर बता दीं कि डाक्टर लोग के हिसाब से कंकाल के उमिर केतना रहे आ बरामद भइला क केतना दिन पहिले ओकर कतल भइल होखी?'
'जी, डाक्टर लोग के कहना हव कि मरत वक्त औरत के उमिर ३० से ३५ के बीच रहल होई, अउरी मरला के करीब एक महिना के भीतरे कंकाल बरामद हो गइल रहल.'
'सिंह साहब, कउनो फगुआ के समय ना बा. काहे चिकारी करत बानी? एके महीना में लाश कंकाल में कइसे बदल जाई?' सिंह साहब के बात सुन के पाड़े जी आपन सवाल दाग दिहले.
'गमछा जी, सब इलाका के आवारा कुत्तन के कारनामा से. ओनही सभन के मुँह में कुछ देख के जब एस. पी. साहब के कुछ शक भइल त घर का पिछवाड़ा से पिछला दस दिना से आवत बदबू के राज जाके खुलल कि ऊ बदबू एही कंकाल से आवत रहल.'
ई सब सुनला क बाद पाड़ेजी एक बेर फेर लाश के पास मिलल सामान के गंभीरता से देखे लगले. उनकर निगाह चाँदी के करधनी आ कड़ा पर आ के टिक जात रहुवे. सब देखला क बाद पाड़ेजी लमहर साँस खींचत कुछ सोचे लगले. फेर सिंह साहब से कहले...
'सिंह साहब, दू काम करे के दरकार बा. जदि रउआ हमरा के कुछ जानकारी दिला देब त ई हमार वादा बा कि महादेव बाबू के कातिल के जइसना ना सिर्फ कंकाल के शिनाख्त हो जाई बलुक हम कातिल के आप तक पहुँचा के दम लेब.'
'जी जरुर. आप जो कहा.' सिंह साहब जवाब दिहले.
'हम कहेब ना. हम लिख के देबे चाहेब.' कह के पाड़ेजी टेबल पर राखल कागज कलम लेके कुछ लिखे लगले आ लिखला के बाद उनका के पकड़ा दिहले. 'लीहिं पढ़ लीं.' कागज देके पाड़ेजी खाड़ हो गइले. 'रउआ हमार काम कर दीं. राउर काम अपनेआप हो जाई.' कह के पाड़ेजी चले लगले त सिंह साहब से ना रह गइल.
'लेकिन आप कंकाल देखे चलत रहला न?'
पाड़ेजी खाड़ होके कुछ सोच के जवाब दिहले...
'जरुर चलेब. बाकि पहिले कागज में लिखल जानकारी इकठ्ठा करवा लीं.' कह के पाड़ेजी ठलुआ के साथे बहरी चल गइले आ सिंह साहब कागज में लिखल पढ़ला के बाद कागज दुसरका अधिकारी के पकड़ा दिहले. ऊहो कागज पढ़ लिहलसि त दुनो जाना एक दुसरा के देखे लगलें.
आखिर का लिखल रहे कागज में? का सिंह साहब पाड़ेजी के माँग पूरा कर पइहें?
पढ़ीं जा अगिला अंक में.....................
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"



अंक - 86 (28 जून 2016)

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