विविध

गमछा पाड़े - 7 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

बनारस के घटनाक्रम से अनजान ठलुआ लखनऊ मेडिकल कालेज के आसपास के दुकानन में कुछ पूछताछ कर रहल बा. ओकरा हाथ में एगो कागज बा अउरी ममता के फोटो भी बा. बारी बारी से ऊ कई दुकानन में गइल आ हर दुकान से लौटत के ओकरा चेहरा पर निराशा झलकत रहे. अइसन कवन काम रहे जे पाड़ेजी ठलुआ के दिहले रहन आ ऊ पूरा मनोयोग से आपन काम करे में लागल रहे? आखिर में एगो दुकान में ओकरा सफलता मिलत लउके लागल बाकि दुकानदार ओकरा के कुछ बतावे के तईयार ना रहे. जब दुकानदार ओकरा के अपना दुकान से भगावे लागल तब ठलुआ अपना जेब से एगो अउरी कागज निकाल के देखावलस. ऊ कागज के देख क दुकानदार सहम गइल आ ठलुआ के कुछ बतावे लागल जेकरा के सुन के ठलुआ पहिले त कुछ निराश भइल आ फेर ओकरा चेहरा पर आश्चर्य के भाव साफ लउके लागल.
सब बात कइला क बाद ठलुआ उँहा से आश्चर्य अउरी निराशा के भाव लिहले लवटि गइल. ओकरा ई अन्दजो ना लागल कि एगो लईकी ओकरा हाथ में ममता के तसवीर देख के ओकरा पर नजर रखले बिया आ ठलुआ के उँहवा से जाते कहीं फोन मिलावे लागल.
'हेलो ममता, आई एम रजनी. सम बडी इज डूइंग इंक्वारि एबाउट यू हियर एण्ड देयर. इज देयर एनीथिंग राँग.? (केहु तोहरा बारे में ईहँवा उहवाँ पूछताछ कर रहल बा. कुछ गड़बड़ त नईखे नू ?)..??'
दुसरा तरफ फोन लाईन पर ममता सब सुन के परेशान हो गइल. ममता अपना सहेली से ई जाने के बहुत कोशिश कइलस कि पूछताछ करे वाला के रहे बाकिर फोन रखला के बाद ओकरो चेहरा से लागत रहे कि ओकरा कुछ खास सफलता ना मिलल. फोन रखला के बाद ऊ बेचैनी से एहर ओहर टहले लागल कि ओकरा पास फेर फोन आइल...
'हैलो...'
'ममता जी हम सिगरा थाने से इंसपेक्टर विजय सिंह बोल रहा हूँ...'
'जी इंस्पेक्टर साहब....'
दुसरा तरफ से इंस्पेक्टर के आवाज ममता के अउरी परेशान कर दिहलस बाकि जब ममता के ई बतावल गइल कि बुआजी अउर मोहन दूनो जाना आपन जुर्म कबूल कर लिहले बा त ओकरा चेहरा पर तनिका खुशी आ गइल. पल भर में ओकरा चेहरा पर लखनऊ के परेशानी के नामोनिशान मिट गइल. इन्सपेक्टर से बात कइला क बाद ममता कहीं फोन लगावे लागल.
'राजन बढ़िया समाचार! बुआजी आ मोहन आपन जुर्म कबूल लेले हउअन. तू जल्दी से घरे आ जा सिगरा थाने जाये के हव.' दुसरा तरफ से आवाज आवे पर ममता राजन के सच्चाई बतवलस त राजनो के खुशी के ठेकाना ना रहे.
'हम अबहीं आवत हईं.' राजन के आवाज सुन के ममता मोबाइल से फेर कउनो नम्बर मिलावे लागल. एतकी पारी दुसरा तरफ से पाड़ेजी के आवाज साफ सुनाई पड़ल.
'हैलो..?
'गमछा चच्चा हम ममता....' दुसरा तरफ के आवाज सुन के ममता जवाब दिहलस.
'हाँ बिटिया, बोल. का बात बा?'
'चच्चा बुआजी अउरी मोहन आपन जुर्म कबूल लेले हउअन. हमके अबहीं सिगरा थाने जाये के हव. आप संझा के आ जाईं अउर आपन ईनाम के रकम ले जाईं.'
'रुपया के कउनो जल्दी नाही बा बिटिया रानी. पुलिस के सामने सच कबूले वाला लोग अदालत में फट से अपना बात पर पलटी मार देबे ला लोग. बाकिर हम शाम के आयेब जरुर. तनी जरुरी बात करे के बा.'
'जी अच्छा...' कहत ममता फोन रख देत बिया पर पाड़ेजी के बात सुन के ऊ फेर सोच में पड़ गईल. आखिर अब कवन जरुरी बात करे के हव अउर चच्चा पइसा लेबे खातिर काहे मना करत हउअन. ममता एही उधेड़बुन में लागल रहे कि राजन के अइला के आहट भइल. राजन क सोझा सहज होखे क बाद ऊ राजन का साथे पुलिस थाने जाये खातिर तैयार होखे भीतर चल गईल.
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ममता के घर के घटनाक्रम से अनजान पाड़ेजी अपना आफिस में चाय पीयत रहन अउरी हमेशा के तरह पंडिताईन के मंत्र जाप चालू रहे.
'का जरुरत रहे मना करे खातिर? रउआ के त पइसा जइसे काटे ला. जदि ठलुआ अपना काम में सफल ना भइल अउरी कचहरी में तोहार बहिना आ मोहना आपन जुर्म नकार देही लोग तब कहँवा जायेब घंटा बजाये?'
एकरा पहिले कि पाड़ेजी पंडिताईन के बात के कुछ जवाब देते ठलुआ आफिस में दाखिल होत बा.
'गुरु पा लागी. गुरुआईन पा लागी.' कहत ठलुआ दुनो जाना के पैर छुअलस आ पाड़ेजी के ममता के फोटो आ एगो कागज दे के सब बतावे लागल. ठलुआ आ पाड़ेजी के बात से साफ लागत रहे कि पाड़ेजी के ममता पर शक रहे आ ऊ ठलुआ के लखनऊ ई जाने खातिर भेजले रहन कि महादेव बाबू के गिलास में मिलल जहर ममता खरीदले रहे कि ना. ठलुआ के सूचना के आधार पर जब ई समझ में आ गइल कि जहर ममता नाही खरीदले बिया त पाड़ेजी तनि सोच में पड़ गइले आ फेर लमहर साँस खींचत बड़बड़इले....
'एकर मतलब ई भइल कि हमार शक सही ना निकलल.'
'अब का होई गुरु.?' ठलुआ सवाल कइलस त पाड़ेजी तनिका सोचे लगले. फेर बड़ा आराम से जवाब दिहले....
'कुछुओ ना होखी. हमार पहिलका शक सही ना भइल बाकि दुसरका में त कउनो दागि ना लागी.'
एतना सुनला के बाद पंडिताइन से ना रहल गइल आ उनकर मन्त्रोचार फेर शुरु हो गईल.
'रसरी जर गइल बाकि अईंठन ना गइल. हम तऽ कहत बानि कि शाम के जाके रुपिया ले लीं आ ओही से भजन मण्डली खोल लीं. जासूसी कइल रउआ बस के बात नाही बा.'
पंडिताईन क बात सुन के पाड़ेजी के मुँह बन गइल बाकि ऊ उनकरा बात पर ध्यान दिहले बिना कहीं फोन लगावे में बिजी हो गइले.
'सिंह साहब, हम गमछा पाड़े बोलत बानी. हम लोग के प्लान ए फेल हो गइल. आ अब प्लान बी पर काम करे के दरकार बा..' दूसरा तरफ से आवाज अइला पर पाड़ेजी जवाब दिहले त पंडिताईन आ ठलुआ दुनो लोग उनकरा के आश्चर्य से देखे लागल. दुसरा तरफ से फिर का कहल गइल ई केहु ना सुनल. सिर्फ पाड़ेजी के छोड़. बाकि पाड़ेजी ई कहत फोन राख दिहले कि ठलुआ वापस आ गइल बा अउरी सब काम वइसहीं करे के बा जइसे कि पहिलहीं से तय बा. फोन रखला के बाद पाड़ेजी कुछ कहतन, पंडिताईन बोल पड़ली...
'तनिका हमहूँ सुनी कि ई पिलान बी का बा?'
'ट्रेड सीक्रेट...' पाड़ेजी दु टूक में जवाब दिहले आ ठलुआ के लेके बहरी चल गइले, पंडिताईन बस दुनो जाना के जात देखत रह गइली.
"आखिर का बा सीक्रेट? गमछा पाड़े क दिमाग सचमुच चलत बा कि खाली दिमागी घोड़ा दउड़ावत बाड़े?"

पढ़ीं अगिला अंक में................
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"
 











अंक - 83 (7 जून 2016)

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