संपादकीय

केशव मोहन पाण्डेय जी कऽ दू गो कबिता

संयुक्त परिवार


होखे कबो झगड़ा
चाहे तकरार
ओहू में छलके
माई-चाची के दुलार
रहि-रहि सुनाला ओहिमे
हुँशियारी, नादानी
एक्के झगड़वा में
दस किस्सा-कहानी।
ऊ झगड़ा ना,
रहे रिश्ता के जहान
रोज नया रचे-बसे
उघटा-पुरान।
केहू पूछे
मिले केहू से जवाब
तबो सब पर चले
सबके हाँक-दाब।
कहे माई
मत करs
नया-नया खेल
छुछुन्नर के माथे
चमेली के तेल।
रचि-रचि करें धनि
सोरहों सिंगार
सगरे सिंगार
घेंघवे बिगाड़।
इचिको ना सहाव
चाची से ई चोट
बड़-बड़ बात करें
कs केs गोट-गोट
अरवा चाउर पर
भात डभकउआ
किने के ना दम बाटे
नाम हs बिकउआ।
बिगड़े बिटिअवा तs
कहेली नागरनाचीन
सात मुस खा के
बिलार भइली भगतीन।
केतनो झगड़ा रहे
बसल रहे तबो प्यार
अब ना ऊ घर बा
ना ऊ परिवार
ना बाड़ी माई-चाची
ना ओह रिश्तन के ताना-बाना
बदलत समइया में
बदल गइल जमाना।
नीको बात पर अब
गरे पड़ेला फाँसी
केकरा से आस करीं
बारी-के-बारी कोइलासी।
छोड़ीं बैर-भाव
काs बाs दूरी तकरार में
बड़ा ताकत होला
एगो संयुक्त परिवार में।
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जिनगी रोटी ना ह


जिनगी
खाली तइयार रोटी ना ह
पानी ह
पिसान ह
रात के अन्हरिया पर
टहकत बिहान ह
कुदारी के बेंट पर
ठेहा लागल हाथ ह
कोड़ झोर कइला पर
सगरो बनत बात ह
बैलन के जोत ह
हर ह
पालो ह
इहे रीत चलेला
अथक सालो-सालो ह
जे दुर्गुण के चेखुर
नोच-नोच फेंकेला
शीत-घाम-बरखा में
अपना देहिया के सेंकेला
ज्ञान-संस्कार के
खाद-पानी डालेला
निरख-निरख गेंहुआ के
जान के जोगे पालेला
बनरी आ मोंथा के
उगहूँ ना देला जे
नेह के पानी सींच-सींच
गलावे सगरो ढेला जे
ऊहे मधु-मिसरी
रोटीया में पावेला
इस्सर-दलिद्दर के
सबके ऊ भावेला
ऊहे बुझेला असली
मन-से-मन के भाषा का,
ऊहे बुझेला
जिनगी के परिभाषा का?
त खेतवा बचाई,
बचाई किसान के
नाहीं त,
हहरे के परी सबके
एक चिटुकी पिसान के।।
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन। 
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख 
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित। 
नाटक लेखन आ प्रस्तुति। 
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण 
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन 
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन. 
संपर्क – 
पता- तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र. 
kmpandey76@gmail.com 
अंक - 83 (7 जून 2016)

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