संपादकीय

जिनिगी के रंग (हाइकु) - रामरक्षा मिश्र विमल

1.
उहाँ का रोज
गवार्इंले जिनिगी
जिये खातिर।
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2.
जिये के चाहीं
जिनिगी अमिरित
पिये के चाहीं।

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 3.
जियल ठीक
जहरो जिनिगी के
पियल ठीक।

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4.
मुसकरा के
जियेला जिंदादिल
हर पल के।

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5.
जीयत चलीं
बहार पतझड़
लागले रही।

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6.
टुटबे करी
जिनिगी खेलौना हऽ
कबो ना कबो।

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7.
जागीं जी जागीं
कब तक सूतबि
जिनिगी छोट।

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8.
काटत बानी
हर पल कसहूँ
जीये खातिर।

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9.
ढोवऽ मत
पहाड़ का माफिक
जिनिगी हटे।

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10.
सासु भइली
गवनहरी बहू
भर जिनिगी।

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11.
जीती भा हारीं
बाकी खेलीं खेलाईं
ईहे जिनिगी।

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12.
जिनिगी माने
ए कोठिला के धान
ओ कोठिला में।

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13.
जिनिगी माने
कापी पेन सियाही
चलत रहीं।
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लेखक परिचय:-

नाम: डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
जन्म: बड़कागाँव, सबल पट्टी, सिमरी
बक्सर, बिहार
जनम दिन: 28 फरवरी, 1962
पिता: स्व. आचार्य काशीनाथ मिश्र
संप्रति: स्नातकोत्तर हिंदी अध्यापक, केन्द्रीय विद्यालय
संपादन: संसृति
रचना: कौन सा उपहार दूँ प्रिय अउरी फगुआ के पहरा
ई-मेल: ramraksha.mishra@yahoo.com


अंक - 85 (21 जून 2016)

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