संपादकीय

मनोज भावुक जी कऽ तीन गो गज़ल

तब से बा अउँजियाइल

जब से शहर में आइल तब से बा अउँजियाइल 
रोटी बदे दुलरुआ खूंटा से बा बन्हाइल 

गदहो के बाप बोले, दिनवो के रात बोले
सुग्गा बनल ई मनई पिंजड़ा में बा पोसाइल

शूगर बढ़ल रहत बा, बी.पी. बढ़ल रहत बा
ग़जबे के जॉब बाटे किडनी ले बा डेराइल

पेटवे से बा कनेक्शन एह जॉब के, एही से 
सहमल बा शेर अउरी गीदड़ बा फनफनाइल 

जे सुर में सुर मिलावल, जे मुंह में मुंह सटावल
ओही के बा तरक्की , ओह पर बहार आइल

मीटिंग के बदले मेटिंग, सर्विस के बदले सेटिंग
जेकरा में ई हुनर बा, ऊ हर जगह फुलाइल 

अंधेर राज में बा चमचन के पूछ भलहीं 
बेरा प यार हरदम टैलेंट कामे आइल 

अन्हियार के मिटावे, सूरज उहे कहाला 
ओही से बाटे दुनिया, ऊहे सदा पुजाइल

अइसे त फेसबुक पर बाड़न हजार साथी
संकट में जब खोजाइल, केहू नजर ना आइल

नेटे प देख लिहलस माई के काम- किरिया
बबुआ बा व्यस्त अतना लंदन से आ न पाइल

साथी के घात से बा गतरे गतर घवाहिल
रिश्तन के जालसाजी भावुक के ना बुझाइल 
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साठ बरिस के भइया

भउजी सोरह के बाड़ी आ साठ बरिस के भइया
बाज के चोंच में देखीं अंटकल बिया एक गौरइया

भिखमंगा जी बेंच के बेटी, दारू पीके कहलें
बाबू बड़ा ना भइया साला सबसे बड़ा रूपइया

“पराम्ब्यूलेटर” में घूमत बाड़े अब डैडी के सन
ऊ का जनिहें का होला ई “पिठइयां अउर कन्हइया”

पूजा में भोंपू बाजत बा “दिल देबू कि ना हो”
और बीच में जय जयकारा “जय सुरसती मइया”

मत पूछीं हमरा से कि हम कब से भटकत बानी
हमरा त लागत बाटे इ जिनगी भूलभुलइया

जब तन के छू के गुजरेला घाव करेला टभ टभ
हमरा अंदर के पीड़ा के जानेला पुरवइया

ससुरारी के मधुवन में हर ग्वालन सुंदर लागे
सरहज लागे सोनपरी आ साली सोनचिरइया

अब त सोनचिरइये जाल बिछावे, फंसे बहेलिया
लोग अनेरे भावुक के बदनाम करेला भईया

पराम्ब्यूलेटर- (Perambulator=pram) – बच्चों को बैठाकर घुमाने की हल्की छोटी गाड़ी
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अगिये बा सिरहानी 

अगिये बा गोड़थानी हमरा, अगिये बा सिरहानी 
आग के बिस्तर पर हम जाने कब से लेटल बानी

लोग समुंदर में हमके फेंकलस कि मछरी खाई
आ हम मुँह में मछरी लेके बाहर निकलल बानी

पहिले अपना चंचल मन के शांत करीं, फेर सोचीं
साफ तबे लउकेला जब अहथिर हो जाला पानी

चिउँटी से नीमन नैतिक शिक्षा ना देला केहू
बाकिर उ नैतिक शिक्षा के कबहूँ बात बखानी ?

जहवें छेद मिलेला, उहवें से ताके-झाँकेले 
आवारा सूरज बाबा के हई देखीं मनमानी

जे आके जाये ना कबहूँ, ओकर नाम बुढापा
जे जाके आवे ना कबहूँ ओकर नाम जवानी

दिल लेके दिल देले बाड़ू, मँगनी नइखू देले
तूहूँ पापड़ बेलले बाड़ू, हमहूँ बेलले बानी

शायर के बीबी बोले कि हम पागल के बीबी
अब जे-जे शायर होखे, ऊ बूझे एकर मानी
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लेखक परिचय:-

नाम: मनोज भावुक
पहिले युगांडा अउरी लन्दन में इंजिनियर
अब मीडिया/टीवी चैनल और फिल्मों में सक्रिय
रचना: तस्वीरी जिंदगी के 

अउरी चलनी में पानी
संपर्क - EMAIL- manojsinghbhawuk@yahoo.co.uk
Mob - 09971955234

अंक - 83 (7 जून 2016)

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