संपादकीय

खदेरन के पाठशाला - (दारू बन्दी) - लव कान्त सिंंह

(पाठशाला में हुड़दंग मचल बा। लबेदवा खजूर के छींवकी से मंगरूआ के पूरा क्लास में दउड़ा-दउड़ा के पीट रहल बा। सब लड़िका हंसत बारें स, खदेरन ओकनी के छोड़ावे के परयास में ओकनी के पीछे-पीछे दउड़त बा तबले मास्टर साहेब के प्रवेश होता। सब लोग अपना-अपना सीट पर भाग जाता। मास्टर साहेब के देखते लबेदवा छींवकी तूड़ के खिड़की से फेंक देता)

मास्टर साहेब - काहे जी, तुम लोग काहे रोज बउआए रहता है। साफ बेलजे हो गया है का ?
सब - गुड मोर्लिंग माहटर साहेब
मास्टर साहेब- हं हं मोर्लिंग, सब लोग बईठो लेकिन लबेदा आ मंगरू तुम लोग बेंच पर खाड़ा होखो। लगता है तुम्हारे बाबूजी को ओरहन देना ही पड़ेगा, चलो बताओ की आज काहे तुम लोग लड़ाई कर रहे थे।
लबेदा- ऐ मास्टर साहेब पहिले ऐकरा से पुछीं की काहे हमरा माई के बारे में गलत-गलत बात कहत रहल ह, ओहीसे मरनी ह ऐकरा के।
मास्टर साहेब- ऐ मंगरू तुम साफ बकलोले रह जाओगे का, काहे किसी के माई-बाप के बारे में गलत भाखा बोलते हो? का बोले थे तनी फेर से बोलो त?
मंगरू- मारसायेब हम कुछो गलत ना कहनी हऽ, अपना हियां दारू बन्दी के खुशी में गांव भर के मेहरारू एगो जुलुस निकलले रहल ह लोग।
मास्टर साहेब - हं त ई त एगो आफते न है जी लेकिन तुम उल्टा-सीधा काहे बक रहे थे ?
मंगरू - पहिले सुनी त, ओह जुलुस के अगुअई लबेदवा के माई करत रहली आ नारा लगावत रहली - ‘‘नाया भतार - नीतीश कुमार’’।
लबेदा- तोहरो माई त साड़ी खूंट के जुलुस में गइल रहली ह आ थपरी पीट-पीट के इहे बतिया दोहरावत रहली ह - ‘‘नाया भतार - नीतीश कुमार’’..‘‘नाया भतार - नीतीश कुमार’’।
मंगरू - पहिले त तोहरे माई नू कहत रहली ह।

लबेदा - छींवकिया के मार भुला गइले का, छुट्टी होखे दे तब बताइले।

मास्टर साहेब- करोगे गुंडई, मारते-मारते दम छोड़ा देंगे। एक्के गांव में रहना है एक्के स्कूल में पढ़ना है आ आपसे में गुंडई करते हो। 56 इन्च का सीना हो गया है तो जाओ ना चाइना-पाकिस्तान से लड़ो, इहां का फंउक रहे हो। 

लबेदा - ऐ मारसायेब, अतने ना बता दीं कि अगर इहे बतिया कवनो रउरा माई के नाम लेके कहले रहीत त का करती रउआ ?

(सब लड़िका हंसत बारें स)

मास्टर साहेब - मारते-मारते पीठांस तुड़ देंगे, ढ़ेर बहसोगे त जानते हो न कि हम केतना लोग को सोझ कर दिए हैं। इ सब में तुम लोग का दोष नहीं है। सब सरकार का दोष है, का जरूरत था दारू बन्द करने का ?

खदेरन - रउआ अइसन काहे कहत बानी मारसायेब, ई त बहुत बन्हिया कदम बा। नीतीश जी मोदी जी के नक्शा-कदम पर चलके कुछ बन्हिया काम त करत बारें नू।

मास्टर साहेब - का बन्हिया काम कर रहे हैं, अरे किताब में भी लिखा है कि प्यासे को पिलाना पूण्य का काम होता है। इहां तो सब पर बैन हो गया।

ढ़ोंढ़ा - (बात काट के) ऐ मास्सायेब उ पानी पियावे के नू पूण्य कहले बा रउरा त ओकर माने ओइसहीं बदलत बानी जइसे कुछ विद्वान लोग संस्कृत के श्लोक के माने बदल के अर्थ अपना फायदा के हिसाब से क देले बा लोग।

(सब लड़िका हंसत बारें स)

मास्टर साहेब - का घड़ी-घड़ी दांत चियारने लगते हो तुम सब। चलो आज इसी बात पर चर्चा किया जाए। सबसे पहिले मंगरू बोलेगा कि शराब बन्दी नीमन है कि बेजायें ?

मंगरू - हमरा हिसाब से ई बहुत गलत भइल काहे कि हमार बाबूजी पहिले बहुत दिन तक बाहर में काम कइलन आ कामे करत में उनकरा हाथ के चारगो अंगूरी कट गइल तबसे गांवे रहे लगलें आ अपना बजारे पर पकउड़ी, अन्डा चप, आ मछरी बेचे लगलें। बजार पर 3 गो अइसन दोकान रहलक ह बाकी सबसे जादा हमरे बाबूजी के दोकान चलत रलक। एकरे कमाई से बड़की दीदी के बियाह 7 लाख दहेज देके रेलवे के डराइबर से भइल।

लबेदा - ह मारसायेब हमनी के ऐकरा दीदी के बियाह में 3 बेर नास्ता कइले रहनी स आ बोतलवा आला ठण्डा में से दूगो हम अपना कमीज में लूका के घरे ले गइल रहनी।

मंगरू - चोर त ते लइकाइयें के हईस, चल तोरा माई से कहत बानी की ते पेप्सी चोरा के ले गइल रहले।

मास्टर साहेब - ई हरवाही में हरकीर्तन काहे करने लगे जी तुमलोग, काहे हमेशा पंजा छाप पार्टी के तरह मुद्दा भटकाते हो, लगेंगे मारने त पसेना छोड़ा देंगे।

मंगरू - हइहे नू बीच में बोलके हमरा के भटकवलस ह।

मास्टर साहेब - तुम भी तो नवाब के नाती न हो जवाब दिए बिना पेट का पानी नहीं न पचता है। जलेबी मत पाड़ो, सीधा-सीधा बोलो कि नीमन है कि बेजांए?

मंगरू - बेजांए बा, काहे कि जबसे दारू बन्द भइल हमरा बाबूजी के दोकान चलल बन्द हो गइल, काहे कि सबसे जादा चीखना हमरे पर से बिकात रहल ह, अब केहू पूछते नइखे तारल मछरी, मीट, अण्डा चप। हार - पाछ के घर के खरची चलावे खातिर बाबूजी फेर सुरत गइल बारन बाकी अंगुरी कटल बा ऐसे कहीं कामों नइखे लागत।

मास्टर साहेब - हं ई बात तो है कि इसके बन्द होने से बेरोजगारी भी बढ़ा है। बताइए जो किसी के पेट पर लात मारा है उसको पापे न चढ़ेगा।

खदेरन - मास्सायेब काहे नइखी पूछत मंगरूआ से कि ऐकर बाबू पी के घरे आवत रहस त काहे रोज गंरासी लेले ऐकरा माई के काटे दउरस आ लागस मारे त जाले केहू छोड़ावे ना जाव ताले ना छोड़स। 

मंगरू - हं त उ त कबो-कबो नू.....

मास्टर साहेब - अच्छा एतना तो चलता है।

खदेरन - ओतने ना बाहर में भी दारूए पी के काम करत में उनकर हाथ मशीन में चल गइल आ चारो अंगूरी कटा गइल। तब्बो आदत ना छोड़ले।

मास्टर साहेब - आरे भाई, त ई कहां के इन्साफ है कि एक आदमी का सजा सब पीने वालों को दिया जाए ? बताओ दारू त अइसा चीज है जो बड़ा-बड़ा डॉक्टर, इंजिनीयर लोग पीता है और दारू के फायदा भी त है।

ढ़ोंढ़ा - मारसायेब खीसियायेम मत बाकी एक दिन रउआ दारू पी के नाली में पटाइल रहनी आ सुअर के बच्चा कुल्ही रउरा देहिया पर खेलत रहे त हमरे चाचा नू रउरा के घरे पहुंचवले ठेला पर लाद के...रउरा मना कइले रहनी ऐसे आज ले हम केहू से ना कहनी।

मास्टर साहेब - तुम ठेपी का ठेपी ही रह जाएगा, आज ले किसी से नहीं कहा आ आज सबके सामने कह दिया... लेकिन ई त कब्बो-कब्बो न होता था। 

लबेदा- झुठ मत बोली मास्सायेब हमहुं एक दिन देखले रहीं रउआ पी के बढ़म बाबा के चबुतरा पर अखड़ेरे सुतल रहीं।

मास्टर साहेब - जादा होसियार बनोगे का ? जब तुम्हारा बाप दारू पी के तुम्हारे माई को पीटता था तब कौन छोड़ाता था?

लबेदा - त हमरा बाबू जी के पीये के आदत भी त रउऐ नू धरइले बानी।

मास्टर - हमारा मगज मत खराब करो नहीं त बखोर देंगे। खाली दारूए में नीशा है खैनी बन्द कीजिए, गांजा, भांग, चरस, अफिम ई सब भी बन्द करवाइए। ई अन्याय खाली दारू वाले पर ही काहे?

खदेरन - ऐ मास्सायेब ऐजा काहे ललटेन लेखा भकभकात बानी जाईं ना रउआ त केजरीवाल के चेला बरले बानी, एकरा खिलाफ करीं धरना आ आमरण अनशन .....लोकतंत्र खतरा में बा।

मास्टर - तुम काहे खाली नोकरिए खाने वाला बात करता है जी, पईसा देके मास्टरी का नोकरी पाएं है अइसे कइसे जाने देंगें। चलो किताब निकालो नहीं त सब कानून ढेंसराना छोड़ा देंगे। 

(छुट्टि के घंटी बाज जाता)
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लव कान्त सिंंह
9643004592










अंक - 81 (24 मई 2016)

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