संपादकीय

होलिआइल मनवा - केशव मोहन पाण्डेय

आज सब केहू 
तनी अगराइल बा।
असों फेरु से
मनवा होलिआइल बा॥

नैना नचाई धनि
नखरा देखावे
दूरवे से छाव करें,
लगवा ना आवें
साँस हमरो
उनहीं में अझुराइल बा॥

हिया में हुलास नाहीं
नेहिया के पानी
पटरी पर रेल के
चलत जिंदगानी
जे के जहाँ देख
ऊँहवे तँवाइल बा॥

बहि गइल फगुआ
उड़ल बा धूरा
सबके मनवा के
आस होखे पूरा
बेअरिया काहें दू
आज के गन्हाइल बा॥

गिरगिट के लखा
रंग बदले मानव
गोर-गोर सूरत बा
मनवा से दानव
अपने चेहरे से
चेहरा डेराइल बा॥

तन रंगीन भले
मन रहे साफ़ हो
माफ़ी मिली तहरो के
तुहुँ कर माफ़ हो
सोता खोल जवन
'अहम' से दबाइल बा॥
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अंक - 82 (31 मई 2016)

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