संपादकीय

कुछ त दीप जरवले जा - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा
रात के बाद सुबह भी होखी, ई एहसास करवले जा.

आपन ढ़पली आपन राग पर, अपने गाल फुलवले बा
आपन दही के मीठ बता के, हर केहु ताल बजवले बा

आँधी में बँसवरिये बाँचल, सबके याद करवले जा
चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा.

गंगा बीच पऊसरा खोलले, दिन भर प्रभु के कोसले बा
एको प्यासा ना आईल काल्ह, सबका आगा रोअले बा

दोसरा का मुक्ति का खातिर, नरक में पाँव बढ़वले जा
चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा.

धरती के हम स्वरग बनाईब, ऊचाँ ख्वाब सोचाईल बा
भवसागर में खुद ना उतरब, सगरो मईल देखाईल बा

बिन मरले स्वर्ग मिलल बा केकरा, बस ईहे दोहरवले जा
चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा.

चारो तरफ घनघोर अँधेरा कुछ त दीप जरवले जा
रात के बाद सुबह भी होखी ई एहसास करवले जा.
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अंक - 82 (31 मई 2016)

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