संपादकीय

बेंगुची चलल ठोंकावे नाल - केशव मोहन पाण्डेय

निहुरत उचकल
गोड़वा मुचकल
ओहू में पूछत सभके हाल।
बेंगुची चलल ठोंकावे नाल॥

ताल तलैया सूखत रहेले
उचरत चिरई कुछूओ कहेले
असरा पर बा गिद्ध के पहरा
पूरवइया पगली हो बहेले
मचल मचल के
हथवा मल के
किरीन बजावे आपन गाल॥

दूअरा पर बा ऐपन लागल
सरधा ले चिंता सभ भागल
कहिया ले त सास फटकीहें
अँजुरी भर के अनजा माँगल
जोर लगा के
बिपत भगा के
मँगरु आज गलइहें दाल॥

बदरा के चदरा तानल बा
ओस बँड़ेरी पर बान्हल बा
लाल पताका आंगन लहरे
लाली गइया के छानल बा
जोर लगाके 
खूँटा तूरे
भले उतर जाए देंह से खाल॥

माई हिरदय के हाल कहेले
दुनिया के जंजाल कहेले
मन मारल देखे बेटा के त
सीना पर हाथ उछाल कहेले
अउर कहेले
देख के हमके
तुही हमरो असली लाल॥
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अंक - 82 (31 मई 2016)

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