संपादकीय

बदरा घुरि-घुरि आवे अँगनवा में - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

बदरा घुरि-घुरि आवे अँगनवाँ में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

मनके महल में सूधिया के पहरा 
प्रीत के हिड़ोले बिरहल लहरा, 
दिल तार-तार होला सपनवाँ में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

आस के डरिया में आँख अझुराइल 
मोह से आपन लोरवा टकाइल, 
केहु लुक-छिप जाला परनवाँ में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

नोचे खसोटेले रात सुधराई 
कोसे मसोसेले मारवान मिताई, 
तनि आड़ घाँट बोधे बिहनवा में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

बैरिन बयरिया डोले बल खाय के 
कंगना पयलिया बोले इठलाय के, 
चैन आवे न बैरी सँवनवा में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

बदरा घुरि घुरि आवे अँगनवाँ में
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 
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अंक - 82 (31 मई 2016)

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