संपादकीय

मंथन - गुलरेज शहजाद

गोंगियात बहत पानी में
चक्कर खात भंवर के
देख रहल बानी हम बइठल
एकटक नजरी के आपन
भंवरी पर हम सटले बानीं
मन भइल बा घूमत पानी
कतना बीतल काल
मथाइल जाता भीतर
कतना विष के गगरी छलछल
करत बीया
कतना गगरी तs अजवारल
धइल बाटे
बीतल काल के एह मंथन में
पहिले के सब मंथन खानी
खलिहा विष उतराता सगरो
कतना कुछ तs हमरो भीतर
चक्कर खा के नाच रहल बा
मौन के भाखा में बेचैनी
आउर बाउर बांच रहल 

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