संपादकीय

मछरी - केशव मोहन पाण्डेय

तड़पत मछरी
तरसत मछरी
नटिका ले नीर बा तब्बो
नयन-नीर बन
बरसत मछरी।
जाल मोह में
निसदिन उलझत
नीर विलग मन
नाहीं सुलझत
असरा भोर
कहिया ले आई
खा के थरिया में
काहें छेंद कराई
सोंझ सड़कीया
सोंझ ना बाटे
मन के मरले
मन मलुआइल 
निरखत मछरी।।
बान्हल गाँठ में
सेन्हा चोर के
करिये मन बा
देहिया गोर के
अंखरत जल में
उछल-उछल के
समय साथ में
समय में ढल के
रोज चिरगवा
बारे हिया में
तब्बो अँजोर ला
हहरत मछरी।
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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