संपादकीय

लछमी पूजन - आर डी एन श्रीवास्तव

दिया दिअरी के तेज परकास
धरती अकास आ तीनों लोक में 
आलोक जगमगात रहे
फूलझड़ियन-पटाखन से
निलका अम्बर थरथरात रहे
छीर सागर सें पति सेवा में लागन
भगवती लछमी के मन चंचल भइल जात रहे
एतना खुसी आ एतना रोसनी से
लछमी नारायन चौंकि गइलें
तब्बे उनके आगे देवरिसि नारद परगट भइलें
भगवान पूछलें “नारद ई कवन बला हऽ? 
ए सोर के कारन आ मतलब का हऽ?”
माथ झुका के नारद जी कहलें, “नारायन! नारायन!
आपो नारायन गजब ढा रहल बानी
धरती पर लछमी पूजन होत बा
लोग देवाली मनावता
आ रउआँ अजुओ भगवती से गोड़ दबवा रहल बानी?
हे दयानिधान! आजु तऽ दूनो बेकति उहाँ जाई
नाहीं कि छूत गरीबी भगावे के भरोसे दे आईं
बाति तनी तीत बा बाकिर सहिए बा
गरीबी हटावल रउरे बस में तऽ नहिए बा;
अब ई अलगा बाति बा
केहू के लॉटरी से, केहू के तस्करी से
एके राति में करोड़पति बना देइब
बाकिर जे मन से, संस्कार से दलिद्दर बा
ओकर का कऽ लेइब?”
छीर सागर के ‘एसी’ वाला सुख तियाग
धरती के अउर-भाग
सोचि के रमापति के मन दुकइसन हो गइल
ओहर लछमी के मन तऽ परसन्न हो गइल
कहलीं, “आर्यपुत्र! कहीं तऽ अकेले धरती पर जाईं
आ अपने बच्चान के असीस दे आईं,
देरी ना लगाइब, सुपर रॉकेट गरुण देव से जाइब
अब आपसे का छिपावे के बा
वापसी में ब्यूटी पॉर्लर आ सेन्टरो जाये के बा।”
धरती पर आ के लछमी हरान हो गइली, परेसान हो गइली
जहाँ-जहाँ जात रहली, तहाँ-तहाँ देखली
दू नम्बर के लछमी
बेटा कुमार भरस्टाचार आ बेटी मिस मिलावट
के साथे पूजात रहली
केहू उनका ओर धेयान ना देत रहे
सभे दू नम्बर वाली लछमी के बलइया लेत रहे;
तबले एगो गिरोह पाछे आवत देखली, रुकली
आ पूछली, “आप कवन लोग हवीं; हमरी पाछे काहें आवत बानी?”
ऊ सब कहलें। “रिसिआईं ना देवी!
लोग हमनी के इनकम टैक्स वाला कहे लेंa
अउरी हमनी के एक नम्बर वालन के 
पीछे पड़ला के पावेनी जा महीना
आज पकड़ा ग इल बानी तऽ आयकर दे के जाईं
ना तऽ हे माया! किछु दिन ‘स्टेट गेस्ट हाउस’ में बिताईं।”
केवनो तरे बिचौलियन के सहजोग से पिण्ड छोड़वली
गरुण के छोड़ि के पैदले छीर सागर ओर गोड़ बढवली
बाकिर उहाँ देखि चकरा गइली
दू नम्बर के लछमी सिरि हरि गोड़ दबावत रहें 
भगवान मुखड़ा चमकत रहे, ओठ मुस्करात रहे
स्वामी के मोहक मुस्कान देखि आपन कुल्ही कलेस 
लछमी भुला गइली
सौत के आगे माथ झुकवली आ कहली
“कई जनमन से ई गोड़ दबा रहल बानी 
बाकिर अइसन मुस्कान तऽ पहिले बेर पा रहल बानी 
जवने तरे सौत के ओर देखि के
स्वामी मुस्करा रहल बानी
ए मुस्कान पर तऽ
हमरे अइसन लाखन लछमी कुरबान बांड़ी
हे नम्बर दू वाली! आपे महान बांड़ी।”
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लेखक परिचय:-

नाम: आर डी एन श्रीवास्तव 
जनम: 10 दिसम्बर 1939 
जनम थान: ग्राम - बैरिया, पो - रामकोला 
जनपद कुशीनगर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा: एम ए (अंग्रेजी साहित्य) 
संप्रति: प्रधानाचार्य (सेवानिवृत्त)
रचना: थाल में बाल, लेट द विण्डो बी ओपेंड (अनुबाद) आदि 
संपर्क: जी - 3/22, रेल विहार फेज - 2
राप्तीनगर फेज - 4, चरगावाँ, गोरखपुर 
मो नं: 9451518429, 770402957
अंक - 79 (10 मई 2016)

2 टिप्‍पणियां:

  1. इहां के व्यंग्य करेजो में चुभेला आ गुदगुदिओ करेला।
    प्रणाम सर

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  2. पाण्डेय जी ! ई बहुते नीमन कार भईल, जो रउआँ अपने गुरूजी के जगत ब्यापी करि देहलीं

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