संपादकीय

केशव मोहन पाण्डेय जी कऽ चार गो कबिता

बेंगुची चलल ठोंकावे नाल

निहुरत उचकल
गोड़वा मुचकल
ओहू में पूछत सभके हाल।
बेंगुची चलल ठोंकावे नाल॥

ताल तलैया सूखत रहेले
उचरत चिरई कुछूओ कहेले
असरा पर बा गिद्ध के पहरा
पूरवइया पगली हो बहेले
मचल मचल के
हथवा मल के
किरीन बजावे आपन गाल॥

दूअरा पर बा ऐपन लागल
सरधा ले चिंता सभ भागल
कहिया ले त सास फटकीहें
अँजुरी भर के अनजा माँगल
जोर लगा के
बिपत भगा के
मँगरु आज गलइहें दाल॥

बदरा के चदरा तानल बा
ओस बँड़ेरी पर बान्हल बा
लाल पताका आंगन लहरे
लाली गइया के छानल बा
जोर लगाके 
खूँटा तूरे
भले उतर जाए देंह से खाल॥

माई हिरदय के हाल कहेले
दुनिया के जंजाल कहेले
मन मारल देखे बेटा के त
सीना पर हाथ उछाल कहेले
अउर कहेले
देख के हमके
तुही हमरो असली लाल॥
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हम टीचर हईं

लोग हमरा के
धरती पर बोझा कहेला
अब त अति हो गइल भाई
अन्हें ना
मुँहवे के सोंझा कहेला
तबो हम कहत बानी
मथमहोर ना हईं
हमरो आपन पहचान बा
कवनो चोर ना हईं।
हमार इतिहास बहुत पुरान बा
हमरे कारण अर्जुन, कर्ण, एकलव्य,
चन्द्रगुप्त, अशोक आदि के पहचान बा
जी भाई
हम टीचर हईं
हम आज के टीचर हईं
हमरा नियत पर
बट्टा लगा के
चरित्र के चासनी में नहवा के
लोग कहेला
कि कीचड़ हईं
हम त
टीचर हईं।
लोग कहेला
त कहला के परवाह नइखे
ईहो बात सही बा
कि हमरा पक्ष में
केहू गवाह नइखे
तबो हम अपना धून में मगन रहेनी
काहें कि
रोज लइका पढ़ावे नी
नाक पोंछेनी
जब अकेले रहेनी
त बड़ा गर्व से सोचेनी
कि ई त काम ह 
महतारी के
हमरा एह काम के निहारी के
का एगो टीचरे चरित्रहीन बा
बाकी सगरो दुनिया जहीन बा?
तब बाबा लोग
जेल में काहें बा
प्रॉपर्टी बढ़ावत बा
निन्यानबे के खेल में काहें बा
कुछ देर बाद
अपनही जवाब मिल जाला
चेहरा हमार खिल जाला
कि हम लइका पढ़ावेनी
आ ऊ दुनिया पढ़ावेले
हम तकदीर बनावेनी
ऊ माथा बिगाड़ेले 
तब्बे एतना भेद बा
चलनी हँसेले सूपा के
जवना में अपनहीं
छिहत्तर गो छेंद बा।
तब खुश हो जानी
अपना नाक पोंछला के काम से
लइका पढ़वला के ईनाम से 
कि केहू से त हमरो गुन मिलेला
अरे भाई
ए कीचड़े में त कमल खिलेला॥
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धोखा

बदलल जमाना
बदलल ओझा सोखा।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

असरा के बदरा उड़ल बन के भुआ
पता लागल तब कि जिनगीया ह धुँआ
धधाले धीअरी त
मन करे रोका।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

लइकन के मीत-गीत सगरो भुलाइल
नुन तेल लकड़ी के चिंता जो आइल
बुद्धिआगर मनई
बनि जाला बोका।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

मँगनी के सतुआ में खाँची भर पानी
केतना बा पानी पुछेली घोघा रानी
अँचरा के ओता में
माजरा अनोखा।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥

छोड़ावे ला मइल मन झाँवा से मलनी
सूपा के देख देख हँसे लागल चलनी
एके गो घरवा में
छिहत्तर गो मोका।
मुँह में बाड़े राम
बगल से मिले धोखा॥
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होलिआइल मनवा

आज सब केहू 
तनी अगराइल बा।
असों फेरु से
मनवा होलिआइल बा॥

नैना नचाई धनि
नखरा देखावे
दूरवे से छाव करें,
लगवा ना आवें
साँस हमरो
उनहीं में अझुराइल बा॥

हिया में हुलास नाहीं
नेहिया के पानी
पटरी पर रेल के
चलत जिंदगानी
जे के जहाँ देख
ऊँहवे तँवाइल बा॥

बहि गइल फगुआ
उड़ल बा धूरा
सबके मनवा के
आस होखे पूरा
बेअरिया काहें दू
आज के गन्हाइल बा॥

गिरगिट के लखा
रंग बदले मानव
गोर-गोर सूरत बा
मनवा से दानव
अपने चेहरे से
चेहरा डेराइल बा॥

तन रंगीन भले
मन रहे साफ़ हो
माफ़ी मिली तहरो के
तुहुँ कर माफ़ हो
सोता खोल जवन
'अहम' से दबाइल बा॥
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन। 
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख 
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित। 
नाटक लेखन आ प्रस्तुति। 
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण 
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन 
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन. 
संपर्क – 
पता- तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र. 
kmpandey76@gmail.com 
अंक - 82 (31 मई 2016)

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