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जाइब झरिया - अरुण शीतांश

जहिया के थरिया
उधारी भइल अब दुपहरिया,
ए करिया भाई !
हमहू जाइब ताबड़तोड़ झरिया।

रेहवा बिकात नइखे 
भूखवा सहात नइखे 
जाईबी संग सघंतिया। 

मतिया कतनो हमार मराई 
ऐ पराई माई
तू रहिह हमरे छांहीं
ऐ दुलारी माई॥

फ़सल बरबादे भइल 
सगरो अन्हारे भइल
जाइब राजीव भाई के
कोठरिया 
ऐ माई!
मिली लूंगी के नोकरिया ऐ माई! 

अंक - 23 (14 अप्रैल 2015)

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