संपादकीय

गुलरेज शहजाद जी कऽ चार गो कबिता


मंथन

गोंगियात बहत पानी में
चक्कर खात भंवर के
देख रहल बानी हम बइठल
एकटक नजरी के आपन
भंवरी पर हम सटले बानीं
मन भइल बा घूमत पानी
कतना बीतल काल
मथाइल जाता भीतर
कतना विष के गगरी छलछल
करत बीया
कतना गगरी तs अजवारल
धइल बाटे
बीतल काल के एह मंथन में
पहिले के सब मंथन खानी
खलिहा विष उतराता सगरो
कतना कुछ तs हमरो भीतर
चक्कर खा के नाच रहल बा
मौन के भाखा में बेचैनी
आउर बाउर बांच रहल 
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बिरहा गाए

सारंगी के धुन उतराला
करुणा के पानी में भींजल
राग फगुनिया
टपटप टपके
सांसन के लय
थरथर करे
दोसर ओरी
"बोल जोगीरा सs रs रs रs रs"

बाँचल जाता
बाकिर मनवाँ बहल जाता
करुणा के पानी में भींजल
लय का जवरे
मन में बेचैनी के अदहन
डभकत बाटे
डूबत आ उतराते कसहूँ
रतिया बीतल
खरगोंछाह सूरुज के किरिन
देह जरावे
बाकिर मनवां पसिजल जाए
करुणा में पानी में भींजल
बिरहा गाए
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ए पानी

अंजुरी में पानी के धइले
सोचs तानीं
ए पानी!

काहे तोहर नेह के छुवन 
दुःख के दाहड़ खानी मन में 
गोंगियाइल बउराइल जाता 
कतना नीमन याद जुड़ल बा 
तोहरा संगे 
लईकाईं में जवरे-जवरे 
खूबे खेल तमासा कईनीं 
घूँट-घूँट तोहरा के भरनीं 
पियास बुझइनीं 
डुबकी लगइनीं 
पोखर में हम 
उबडुब भइनीं 
नाहर तीरे 
गोड़ लटइले,घंटन 
छपछप-छपछप कइनीं 
आ बरखा में तोहरा संगे 
लपिटइनीं हम 
नचनीं गइनीं 
अब काहे तू मुंह चोरइलs 
धरती के भितरी घुसियइलs 
तोड़लs बरखा से तू नाता 
ई हितई में धोखा भइल 
मननीं कि हम तोहरा संगे 
धोखा कइनीं 
आपन गरज-मतलब खातिर 
बे मतलब के खरच कइनीं 
नद्दी नाला ताल तलैया 
नाहर पोखर 
मतलब कि जे तोहर घर बा 
ओकरा के ना बुझनीं जननीं 
सबके हम परदुसित कइनीं 
साँच बात तs इहे बाटे,कि 
हमनीं के धोखा कइनीं 
तोहरा संगे 
अब हम कतना बात बताईं 
कतना लजाईं 
माफ़ करs अब 
जाए दs तू 
लवटs अब कि 
कतना नवका बालक-बुतरू 
तोहर रास्ता देख रहल बा 
अब ओकनी के राह देखावs 
नाचs गावs खेल खेलावs 
ओकनी के जिनगी समझावs 
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सावन 

"बदरी के बदरा पिठियवलस" 
श्याम रंग में मौसम गावे 
आसमान के खोंखी उखड़ल 
लागल बरसे झमझम बूनी 
लागे जइसे छमछम करत 
गोरिया अइली 
जंगला धइले देखs तानीं 
आई हो दादा 
आहा हा हा .... 

पड़ल जे छिंटका बूनी के 
मुंह पर लागल 
अमरित गिरल 
पपनी पर पपनी सटियाइल 
सिहक गइल देहिया,भितरी 
गुद्गुद्दी उपिटल 

फुहियाता ई बूनी खाली 
बहरे नाहीं 
हमरो भीतर 
बून-बून के झांझर बाजे 
एह लय में आ ताल में हमरो 
मन के माटी भींज गइल बा 
बाहर भीतर सभे गीले गील भइल बा 
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लेखक परिचय:-

कवि एवं लेखक
चंपारण (बिहार)
E-mail:- gulrez300@gmail.com 



अंक - 78 (03 मई 2016)

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