संपादकीय

चिन्ता के अगनी - राधा मोहन चौबे 'अंजन'

चिन्ता के अगनी तहरा के लेस-लेस खा जइहें
ए मैना तू आसरा छोड , तोता फेरु ना अइहें।

काहें आंख मिलवलू कइलू फुदुक-फुदुक के खेला
पतइन के कोरा में सटि के खूब लगवलू मेला
ना जनलू की पतझड़ आई, पात-पात झर जइहें
ए मैना तू आसरा छोड़ , तोता फेरु ना अइहें।

ढेर बहाना कइलू जग से, कनखी से बतिअवलू
देश-काल मौसम सगरो के ठुकरवलू लतिअवलू
पछतइला में का बाटे अब बीतल दिन लवटइहें
ए मैना तू आसरा छोड़ , तोता फेरु ना अइहें

फगुनी हवा चइता के पुरवा बरखा परल फकारी
जड़वा के साथे-साथे रस लुटलू पांखि पसारी
भरल उमरिया के सब साथी ढलती के अपनइहें
ए मैना तू आसरा छोड़ , तोता फेरु ना अइहें

आपन जिंनगी अपने काट ना केहू दुख बांटी
इ दुनिया ह सुख के साथी दुख के देहियां माटी
सुख में जे-जे चहकल साथे असमय देख परइहें
ए मैना तू आसरा छोड़ , तोता फेरु ना अइहें

लागल पल भर पलक सुगनवा अचके में आ गइले
अइसन उमगल प्राण दुनू के साथे में उड़ गइले
मिलल नयन तब प्राण जुड़ाइल अंजन नसन जुड़इहें
ए मैना तू आसरा छोड़ , तोता फेरु ना अइहें
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लेखक परिचय:-

नाम: राधा मोहन चौबे 'अंजन'
जनम: 4 दिसम्बर 1938
जनम थान: शाहपुर-डिघवा, थाना-भोरे
गोपालगंज, बिहार
रचना: कजरौटा, फुहार, संझवत, पनका, सनेश, कनखी, नवचा नेह, 
अंजुरी, अंजन के लोकप्रिय गीत, हिलोर आदि
अंक - 80 (17 मई 2016)

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