संपादकीय

ओकर कहल - रामरक्षा मिश्र विमल

चउबिस बरिस का उमिरि में बिरासन मास्टटर बनि गइल रहन। जहिया ज्वाइन कइलन ओही दिन से उनुकर प्रभाव लउके लागल रहे। सभ लइका-लइकी उनुका स्मार्टनेश से प्रभावित रहले सन। एगो चुलबुल लइकी जवन केहू से डेराइ ना, हमेशा हँसत-मुसकात रहे, एक दिन अनासे उनुका से कहि दिहलस- “सर, आपकी आँखें मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। लगता है, जैसे उनमें नशा हो।” ई कंम्प्लिमेंट त जइसे उनका मन का अँतरा समा गइल। संकोची सुभाव के बिरासन अपना आर्थिक गरीबी के दुनिया से एकदम बाहर आ गइले। लागल जइसे ए अनमोल धन के उनकर केहू सानी नइखे। 
आजु जब बेटा चश्मा धोके ले आइल हा आ बरियारी अपने से पहिना देलस हा त ऊ अचकचा के ओकरा के देखे लगले हा- केशव यह परिवर्तन कैसे ?” तले लइका एगो कंम्प्लिमेंट जड़ दिहलसि- पापा, आपमें चश्मा बहुत खिलता है.” बिरासन के आँखि भर आइलि. आजु ओकर कहल एक-एक शब्द याद आ रहल बा. 

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लेखक परिचय:-

नाम: डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
जन्म: बड़कागाँव, सबल पट्टी, सिमरी 
बक्सर, बिहार 
जनम दिन: 28 फरवरी, 1962
पिता: स्व. आचार्य काशीनाथ मिश्र 
संप्रति: स्नातकोत्तर हिंदी अध्यापक, केन्द्रीय विद्यालय
संपादन: संसृति
रचना: कौन सा उपहार दूँ प्रिय अउरी फगुआ के पहरा 
ई-मेल: ramraksha.mishra@yahoo.com
अंक - 79 (10 मई 2016)

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