संपादकीय

अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु" जी कऽ चार गो कबिता

माई रे हम जेल जाइब

माई रे हम जेल जाइब कुछ अउर नाही तऽ नेता ही बन जाइब, 
माई रे हम जेल जाइब. 

बचपन में हम ध्यान ना दिहिलीं एक से बढ़के खेला हम कइलीं, 
कसम खिया ले हमसे माई ईऽ गलती अब ना दोहराईब. 
माई रे हम जेल जाइब. 

पढ़ली लिखिलीं बीए पास केहु ना डललस हमके घास, 
का करेब हम नौकरी करके ऐकौ धेला बचा ना पाइब. 
माई रे हम जेल जाइब. 

बाबू कहले धन्धा कइलीं सब चिजीया में मिलावट कइलीं,
हमरो भी ईमान धरम बा इहै बात तोहके समझाइब. 
माई रे हम जेल जाइब. 

नेता बनके नाम कमाइऽब नाम कमाइब दाम कमाइऽब, 
जे ना मानी हमरा बात हम ओके मिट्टी में मिलाइब. 
माई रे हम जेल जाइब.
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आयल मधुमास कोयलिया बोले

आयल मधुमास कोयलिया बोले . 

लाल लाल सेमरु पलास बन फूले 
सुमनो की क्यारी में भँवरा मन डोले, 
किसलय किशोरी डारन संङ झूले 
महुआ मगन हो गन्ध द्वार खोले. 
आयल मधुमास कोयलिया बोले . 

सुगन्धित पवन भइ चलल होले होले
ढोलक मंजिरा से गूँजल घर टोले
रंग पिचकारी मिल करत किकोले 
छनि छनि भंग सब बनल बमभोले. 
आयल मधुमास कोयलिया बोले . 

उड्ल गुलाल लाल भर भर झोले 
मीत के एहसास बढल मन के हिडोले
धरती आकाश सगरे प्रेम रस घोले 
मख्खियन के झुण्ड पराग के टटोले. 
आयल मधुमास कोयलिया बोले .
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बदरा घुरि-घुरि आवे अँगनवा में

बदरा घुरि-घुरि आवे अँगनवाँ में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

मनके महल में सूधिया के पहरा 
प्रीत के हिड़ोले बिरहल लहरा, 
दिल तार-तार होला सपनवाँ में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

आस के डरिया में आँख अझुराइल 
मोह से आपन लोरवा टकाइल, 
केहु लुक-छिप जाला परनवाँ में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

नोचे खसोटेले रात सुधराई 
कोसे मसोसेले मारवान मिताई, 
तनि आड़ घाँट बोधे बिहनवा में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

बैरिन बयरिया डोले बल खाय के 
कंगना पयलिया बोले इठलाय के, 
चैन आवे न बैरी सँवनवा में 
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 

बदरा घुरि घुरि आवे अँगनवाँ में
नींद नाहि आवे भवनवाँ में।। 
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कुछ त दीप जरवले जा

चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा
रात के बाद सुबह भी होखी, ई एहसास करवले जा.

आपन ढ़पली आपन राग पर, अपने गाल फुलवले बा
आपन दही के मीठ बता के, हर केहु ताल बजवले बा

आँधी में बँसवरिये बाँचल, सबके याद करवले जा
चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा.

गंगा बीच पऊसरा खोलले, दिन भर प्रभु के कोसले बा
एको प्यासा ना आईल काल्ह, सबका आगा रोअले बा

दोसरा का मुक्ति का खातिर, नरक में पाँव बढ़वले जा
चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा.

धरती के हम स्वरग बनाईब, ऊचाँ ख्वाब सोचाईल बा
भवसागर में खुद ना उतरब, सगरो मईल देखाईल बा

बिन मरले स्वर्ग मिलल बा केकरा, बस ईहे दोहरवले जा
चारो तरफ घनघोर अँधेरा, कुछ त दीप जरवले जा.

चारो तरफ घनघोर अँधेरा कुछ त दीप जरवले जा
रात के बाद सुबह भी होखी ई एहसास करवले जा.
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 82 (31 मई 2016)

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