संपादकीय

आदमी - विजय मिश्रा 'बाबा'

फ़क़त एगो ख़ुशी का तलाश में भटक बाटे आदमी
अपने जमीनों जर से जुदा हो कसकत बाटे आदमी
का नईखे ऐह माटी में जोहे से पलटत बाटे आदमी
ज़िये के जद्दोजहद में अँगोरा अस धधकत बाटे आदमी
ख़ास अपनों से मिले खातिरा चेहरा बदलत बाटे आदमी
केने का अझुराईल बा खाता बही पलटत बाटे आदमी
छोड़ छाड़ि माटियो के काहाँवा जुदा होत बाटे आदमी
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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