संपादकीय

फेनुस - रामनाथ राजेश

ओह दिन गबुदना एक दम गेना लेखा उछलत आइल रहे. असहूं ऊ हमेशा बत्तीसी देखाइएके बोलेला. हम ओकरा के कब से जानतानी ठीक से नइखीं कह सकत. भंइसी के चरवाही में जब जाइब त देखब कि टोला भर के भंइस ऊ अकेलहीं हांकता. सांच कहीं त हमनी के चरवाही में गबुदना के रहते कवनो चिंता ना रहल. 
हमनी के टोला भर के सेयान लइका कौनों फेंड़ा तर बइठ जाइब जा. फेर ताश निकली. चार-छव गो आदमी खेले वाला अउर बाकी देखे वाला, उहो कवनो ना कवनो पार्टी के सपोर्टर बन के. जम के हाला होई. जब ढेर हाला होई त गबुदनो आ के देखे लागी. तबङ्क्षहए अद बद के कौनों ना कौनों भंइस केहू के जियका जिआन करे लागी. जिआन ना करी त ओह खेत के आरी जरूर चल जाई. खेलत आदमी में से केहू जोर से चिचिआई- अरे साला ते हूं एहीजे आ गइलस भइंस गइल चरलख बिरवाई.
गबुदना हंस के डंटा ले के दउड़ी अउर चिचिआई -आवतानी हो-तोहरा एने नइखे चरल जात. ओकर आवाज सुनते भइंस भाग चलिहें स. ई रोज के ओकर काम रही. चरवाही में आवे वाला लोग में आईए बीए पढ़ल से लेके अंगूठा छाप तक सभे रही. उमिरो में आठ-नौ बरिस के गबुदना से लेके सतर बरीस के टीकाधारी बाबा तक. जनावरो में केहू के एगो भइंस त कोई के दुगो. ओकरा साथे पाड़ी. गबुदना के चरवाही से रिश्ता ओकरा पाड़ी के कारण रहे. जब ऊ आठ बरिस के रहे त कतहीं से पाड़ी ले आके ओकर माई ओकरा के देले रहे. खइला बिना टूटल रहे. पहिले त आठ-दस दिन तक बकरी अस बांध के दुआरी भिरी चरवलख. बाद में तनीएसा टुकटुकाइल त उहो चरवाही में ले जाए के जिद करे लागल.
ओकर माई हमरा घरे गोबर-गोंइठा करत रहे. एक दिन आके हमरा माई से कहलक कि देखीं मलकिनी हमार लइका नादान बा- चरवाही में जाए के जिद करता. तनी कहदेम कि बबुआन लोग मारी मत. ओकरा बाद से ऊ आपन पाड़ी लेके चरवाही में आवे लागल. ओह घरी हमहूं मैटरिक के इंतिहान देके गांवही रहीं. कभी-कभार चरवाहियो में जात रही. गबुदना बधारी में हमेशा अपना पाड़ी के साथ ही रही. जब कोई हंसी कि जवरे काहे घूमतारे रे! त कही कि एकरा के कवनो भइंस मारी त तू बचइबऽ. हमरा कालेज में नाम लिखाए तक निकहा दिन बीत गइल. 
चरवहिओ के एगो अलगे दुनिया रहे. हमेशा दु गो दल रही. एगो बुढ़वा दल एगो नएका दल. दुनो दल के बातो करे के अलगे-अलगे मसाला रही. बुढ़वा दल बतियाई कि केकरा लइका के मेहरारू अपना सास जोरे झगड़ा करतिया. केकर लइका कतना मनीआर्डर भेजता. ब्लॉक के साहेब घूसहा बा कि ना. कोर्ट कचहरी के किस्सा. 
नयका दल में कवना बरात में कइसन नाच रहे. सबसे बढिय़ा जोकर कवना नाच के बा. शहर से कोई जाई त सिनेमा के बात पर बहस होई फेर ताश पटकाई. गबुदनो नएके दल में रही. देखते-देखते कब चार साल गुजर गइल ई पाता ना चलल.
हम बीएसी फाइनल के इंतिहान देबे के रहीं. ओह पाड़ी के चरावत गबुदना के चार बरिस हो गइल रहे. कतना लोग के पाड़ी त तीने बरिस पोसला प बाचा दे देली स बाकिर गबुदना के पाड़ी अबहीं पाडि़ए रहे. एक दिन गबुदना दुआर प एकदम कूदत आइल. हम पूछतीं एकरा पहिलहीं जोर-जोर से बोले लागल -भइया हो हमार पडिय़ा आज भंइस हो गइल. गोरेआ बाबा अब ओकरा के बाचा दिहें. माई कहतिया कि अब हमार भाग उजियार हो जाई. हमरा मुंह से निकल गइल- तब हमरो के फेनुस खिअईबे नू! तोहरा के त खिअइबे करब, दू सांझ के फेनुस चरवहियो में सब कोई के ले जाके बांटब. गुड़ वाला ना बगबग उजर चीनी वाला. ई कहे में ओकर आंख के चमक देखते बनत रहे. 
गबुदना चार भाई ह. ओकर बाबू हमरा घरे हरवाह रहन. बड़का भाई गांंवे ना रहे पटना में रेकसा चलावेला. ओकरा से छोटका हमरे गोतिया में हरवाही करेला. मेहरारू आवते ऊ माई बाबू से अलगा हो गइल. ई भाइन में तीसर ह. चउथा अबहीं पांच-छव बरिस के बा. ओकर बाबू के दामा हो गइल बा हमेशा हांफते रहेलन. 
जब हम गांवे से पटना पढ़े आवे लागब त गबुदना हमार सामान लेके बस धरावे पीरो आई. जाए लागी त कबहीं आठ आना त कबहीं एक रोपेया ओकरा के धरा देब. संकरात के मेला अबहूंओ लागेला बचरी फाल प. तेलहा जिलेबी, लाई तिलकुट खूब बिकाला. एगो दूगो घुघुरो घांटी के दोकान रहेला. पिछिला बार पटना आवे लागल रहीं त गबुदना रहता में बोलल-ए भइया एगो बात पूछीं. हम गरदन हिलइनी त पूछलक- तोहरा भूअरी भंइसिया के गरदन में जवन बान्हल बा तवन कतना के होई. हम कहनी कि ऊ त चोटी ह रे, काहे के! हंं बताव ना, कतना के ह! हम कहनी होई पांच-सात रूपिया के . जवाब सुन के ऊ चुप लगा गइल. बस में चढ़ा के चले लागल त हमरा भिरी खुदरा पइसा ना रहे. देखनी की टुकुर-टुकुर ताकत रहे. बगली में हाथ डलनी त दू रूपिया निकलल. हम दू के नोट ओकरा के थमा देनी. मिलला के बाद ऊ उछलत-कूदत चल गइल. संकरात बाद जब गांवे अइनी अउर चरवाही में गइनी त गबुदना के चरचा रहे. एकदम हमरे भुअरी भंइस के जस ओकरो पाड़ी के चोटी बान्हल रहे. भादो में दू-तीन बरिस से गबुदना के इहां खरची ओरा जात रहे. जब ओकरा पडिय़ा के बाचा देवे में दू-तीन महीना देरी रहे, दू दिन से घास सूंघते ना रहे. पीरा मियां से ओझाई करइलख. केहू कहल कि दू-तीन दिन भूसा खिआव, पाव भर करू तेल दे दे त ठीक हो जाई. बूनी पानी के दिन में गवतो के बड़ा दिकदारी रहे. ओकर माई आके बीस रूपिया के भूसा कीन के ले गइल एक मोटरी उधार. ई कहके कि दू महीना बाद जब बाचा दिही त रूपिया दे जाई. 
गबुदना के भंइस जब बंसा तुरलक तब हमरा घरे खुसुर-फुसुर होखे लागल. बड़की भउजी माई से कहली कि गबुदना के पडिय़ा के दाम क के दुआर पर मंगा लेबे के काम बा. माई पूछली कि अपने ह का! तब भउजी असली बात बतइली. कहली कि उनका नइहर के कुछ रूपिया रहे. कुछ एहिजा मुंह देखवनी मिलल रहे. उनकर भइया आइल रहन त उहे ई पाड़ी किन के गबुदना के माई के बटइया पर दे देले रहन. 
ई बात सुन के घरे सभे बड़ा खुश भइल. बाबूजी जब अंगना खाए अइले त पूछले कि कइसे देल बा. भउजी केंवाड़ी के ओटा से कहली कि दाम काढ़ के अधिया प-बाबूजी पूछले-कतना के लेल ह-भउजी कहली-एगारह सौ के. जब हमार छोटका भाई सुनलस कि गबुदना के पडिय़ा आपने ह त सुन के खुशी से उछले लागल. रोज बाबूजी अउर भइया से जिद करे लागल कि जलदी ले आव जा. बाबूजी कहले कि दू चार दिन उहो खालसन तब आई. छोटका भउजी भिरी चल गइल. लागल ठुनुके-पहिला फेनुस हमनिए के खाइब जा. भउजी माई से कहली कि बबुआजी जिद कर तानी त काहे नईखीं जा ले आवत. ओकरा आपना खाए के ठीके नइखे, बाचा दिही त गुड़ तेल ऊ कहां से ले आई. फेर जादे दूध उतारी त दामो ढेर होई. आमाजी बाबूजी से कहीं ना-
माइओ के बतिया नीमन लागल. माई बाबूजी के समझइली. बाबूजी आ भइया दाम करेके राजी हो गइले. गबुदना के माई के बोलावल गइल. ऊ आवते कहलख कि रउए सभे के नू धन ह. दामो रउए सभे के नू करेके बा. बाकी बाचा दे देबे दिहीं. गबुदना बड़ा नेह लगा के पोसले बा ओकरा के. फेनुस के उहो आस लगइले बा. हमार छोटका भाई ओहिजे खाड़ा रहे. बाबूजी से ना-ना करके जिद करे लागल. पाता ना काहे ओह घरी हमरा अपना छोटका भाई के सुभाव तनिको ना बढिय़ा लागल. बाबूजी कहले, भंइस आवे द-हमरा बेटा के मन बा. का भइल बा गबुदना एहिजे आके फेनुस खा लिही. गबुदना के माई चुप लगा गइल.

थोड़े देर बाद हमरा गोतिया के बाबा आ गइले. बाबूजी उनका के लेके अकेले में कुछ-कुछ बतिअइले. कुछ देर बाद टोला में के अवरू चार-पांच आदमी जुट गइले जा. छोटका भाई जा के गबुदना के बाबू के बोला ले आइल. दाम होखे लागल.
बाबा कहले कि भंइस के दाम पैंतीस सौ भइल. गबुदना के बाबू कहले-मालिक बहुते कम होता. राउर धन छव हजार से कम के नइखे. बाबा खिसिया के कहले कि त ते ही राख ले छव हजार में. एह प ओकर बाबू चुप हो गइले. हमार बाबूजी ओकरा बाद कहले कि चल चार हजार भइल. अब कुछ नइखे नू कहे के. हमरा के लोग कहल कि बबुआ हिसाब क द. चार हजार में से एगारह सौ निकाल द त बांचल उन्तीस सौ. फेर ओकर आधा. दू साल पहिले ओकर माई भादो में दू मन चाउर ले गइल रहे. डेढ़ा के हिसाब से तीन मन भइल. पिछलो साल एक मन चाउर ले गइल रहे. टोला भर में हमार बाबूजी उदार गिनाले. चाउर के भाव ओह घरी एक सौ पन्दरह रुपिया मन चलत रहे. जोर से कह ले- सइए रुपिया मन जोडि़हे. कुल मिला के एक दू कलम अउर हिसाब निकल गइल. साढ़े चउदह सौ हिसाब भइल. छव सौ रुपिया हमरा घर के चाउर के बकाया जोड़ाइल. बाकी बाचल साढ़े आठ सौ. बाबूजी रुपिया निकाल के देवे लगले त पता ना कहंवा से पूरा टोला जुट गइल. केहू के गेहूंं के त केहू के दोकानी में के समान के त, देखते देखते चार सौ रुपिया अउर बंटा गइल. जब साढ़े चार सौ बांचल त गबुदना के बाबू कहले कि जब पगहा धरब त रुपिया गबुदना के हाथ में दे देब. भंइस ले आवे खातिर हम, हमार छोटका भाई, बाबूजी, गोतिया में के बाबा सभे गइल. ओकरा दुआरी पर गइनी जा त गबुदना बांस के पतई तुर के लेके आइल. अपना दुआरी पर अतना भीड़ देख के हड़बड़ा गइल. हमरा भिरी आके पूछलख कि भइया अतना आदमी काहे खातिर आइल बाडज़ा. हमरा मुंह से कुछुओ न निकलल. ऊ जोर-जोर से पूछे लागल-बोला ना भइया- बोला ना. हमार छोटका भाई कहलक-तोर पडिय़ा ले जाए. केहू हमार पडिय़ा काहे ले जाई, हम ना ले जाए देब. ई कहके ऊ दउड़ के अपना बाबू भिरी चल गइल. ई लोग पडिय़ा ले जाए आइल बाड़े रोक ना बाबू. ई त हमार हिय नू कहके भोंकार पार के रोए लागल. 
ना बबुआ ई तोहार ना ह- ई त मालिक के ह- पोसिया रहे. ना-ना तू त कहत रहा कि हमार ह, मत जाए द बाबू मत जाए द. ओकर रोआई सुन के ओकर बाबूओ के आंख डबडिया गइल. हमरा ओरे ताक के कहले - रउए समझाईं. 
हम समझइनी- गबूदन का तू चाहतारे कि तोहार पडिय़ा बाचा देवे त गवत बिना मर जाए-बाचा खातिर दाना चाहीं, भूसा चाहीं. जब एकरा गुड़ तेल ना मिली त कतना तकलीफ बीती. हमरा इंहा गुड़, तेल, भूसा, दाना सब बा. ले जाए दे. गबुदना चुप हो गइल. ओकर बाबू कहले- मालिक के पगहा धरा द- बाबूजी हमरा ओरे इशारा कइले. हमरा हिम्मत ना भइल. हम अपना छोटका भाई के इशारा क देनी. गबुदना एक बेर पडिय़ा के देखलख. फेर पगहा खोले लागल. हम अपना भाई के हाथ में साढ़े चार सौ रुपिया थमा देनी. गबुदना पगहा धरा देलस आ हमार भाई गबुदना के रुपिया. ऊ रुपियाअइसे मुट्ठी में दबइलस कि नया नोट चमोरा-ममोरा गइल. हमनी के ओकर पडिय़ा लेके घरे आवत रहीं जा. ऊ दउड़ल-दउड़ल आइल. ओकरा हाथ में दुगो करिया गुडिय़ा रहे. हमरा हाथ में दे के कहलक- भइया जब पडिय़ा होई त दूनो के बान्ह दी ह. नजर ना लागी. फेर बिना पडिय़ा ओरे तकले मुड़ी गाड़ के भाग गइल. 
हमरा दुआर पर बन्हइला के एके घंटा बाद गबुदना के पडिय़ा बाचा देलख पाड़ी. सांझी खानी फेनुस फराइल अपना टोला में बंटाइल. जब हमरा खाए खातिर फेनुस आइल त पता ना काहे हमरा गबुदना के बात बहुत इयाद आवे लागल. मन कइलख कि गबुदनो के बोला के फेनुस खिया दिहीं, फेर अपने से सवाल कइनी कि का ओकरा ई नीमन लागी. काहे दोनी हमरा फेनुस ना घोंटाइल. हमरा अपने बुद्घि प शरम आवे लागल. फिर ना जाने का मन में आइल कि फेनुस के कटोरा ले जाके ओकरा पडिय़ा के नाद में उलट देनी, ई मान के कि गबुदना फेनुस खा ली.
साभार: संडे इंडियन
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रामनाथ राजेश
अंक - 75 (12 अप्रैल 2016)

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