मैना: वर्ष - 3 अंक - 74

वर्ष प्रतिपदा: लोक कऽ नाया साल


आवे आला 8 अप्रैल से वर्ष प्रतिपदा विक्रमी संवत 2073, जेवन भारत के सांस्कृतिक रुप से नाया साल हऽ, शुरू हो रहल बा अ उरी सङही नवरात। जलवायु के हिसाब से वर्ष प्रतिपदा के दिन से मौसम बदले शुरू हो जाला। रबी कऽ फसल पाकेला लागेला अउरी किसान आपन महीनन के मेहनत घरे ले जाए लागेला तऽ जन-मजूर अउरी चिरई-चुरूङ के अँजूरी अनाज से भरे शुरू हो जाला। परम्परा के हिसाब से लोग नाया जौ नवरात के पूजा में लगा के भगवान के धन्नेबाद बोलेला। पर आज ई परम्परा बिलाए के वाली बे अउरी जेवन तेवहार कबो लोक के तेवहार रहे आज लोक के नजरी से उतरि गइल बा। 
केवनो तेवहार भा परम्परा अपना देश, काल, परिस्थिति, समाज अउरी अर्थबेवस्था के हिसाब से बनेला अउरी बिगरेला। जइसे-जइसे ई बेवस्था बदलेला ओही तरे तेवहार अउरी परम्परा आपन रूप अउरी मतलब दूनू बदलेला। भारत के लोक परम्परा में नाया साल चइत के शुक्ल पख के प्रतिपदा से शुरू होखेला जेवन वर्ष प्रतिपदा कहाला अउरी ई तेवहार कबो भारत के लोक जीवन कऽ अभिन्न हिस्सा रहे पर आज के साँच कुछ अउर बा। 
आज के पीढी खाती नाया साल अब 1 जनवरी से शुरू होला ना कि वर्ष प्रतिपदा से। अउरी ई बदलाव बस कुछ दसक में आइल बा। एह बदलाव के विस्तार खाली शहर ले नइखे बलुक गाँव देहातो में अब नाया साल के मतलब 1 जनवरी होखेला। एगो बरिआर सवाल खाड़ा होता कि अइसन का भऽ गकइल बा कि बस कुछ दसकन में गाँव देहातो आपन परम्परा अउरी पुरखन छोड़ जात बा अउरी पछिम के ओर भागल जात बा।
केवनो समाज के बनावे अउरी खाड़ा करे में ओह समाज के शिक्षा बेवस्था के सभसे बरिआर जोगदान होला अउरी ओकरा बाद सभसे महता बा अर्थबेवस्था के। 1857 के बाद भारत के सगरी शिक्षा अउरी अर्थबेवस्था कुछ अइसन बनावे के परियास शुरू होखे लागल कि भारत कें रहे वाला लोगन के अपनी पुरखन पर लाज आवे लागो। एह देश के इतिहास अउरी अर्थशास्त्र के कुछ एह ढंग से पढे-पढावे के परम्परा शुरू कइल गइल कि एह देश ले रहबासी के भीतर नीच के भाव पैदा हो गइल अउरी आजादी के बाद विकास अउरी प्रगतिशीलता के नाँव पर लोगन के जड़ से काटे सिलसिला शुरु भइल जेवन भारत के हर चीझन के गलत अउरी छोटहन बना के पेस करे लागल। बस धीरे-धीरे पश्चिमीकरन कऽ हवा बहे लागल जेवन पहिले शहरन में जोर पड़कलस अउरी परबासी मजूरन के हाथे-गोड़े गाँवन में पहुंचे शुरू भइल। एही घरी सिनेमा, टीवी, सूचना तकनीक अउरी पश्चिमी विचारन के दमे अर्थबेवस्था में आइल विकास सहजोगी बनि एह गति के बढा दिहलस।
सङही नाया साल से लोक के दूर भइला में मौसम, जलवायु अउरी खेती-बारी में तरीका में आइल बदलावो के बहुत बड़हन जोगदान बा। मौसम, जलवायु अउरी विज्ञान तीनों मिल के खेती ढंग अउरी समय के बदल देले बा। अब रबी के फसल वर्ष प्रतिपदा के बहुत बाद पाके शुरू होता आ कटिआ अउरी दंवरी होत जेठ बीत जात बा। अब हाल ई बा नवरात में चढावे खाती नाया अनाज मिलल पहाड़ हो गइल बा अउरी अब लोग पुरान अनाजो पूजा कऽ लेत बा। 
तीसरा बरिआर कारन बा देश के सगरी अर्थबेवस्था में आइल बदलाव। कबो एह देस में खेती-बारी, लघु उद्योग आ बेयपार रोजी रोटी कमाए के जरिया रहे। बाकिर अठारहवीं शताब्दी के आखिर से योजनागत ढंग से लघु उद्योग खतम कऽ दिहल गइल अउरी खेती-बारी पर रोजी-रोटी भार आ गइल अउरी आजादी के बाद बड़ उद्योग अउरी बेयपार के महता बढ़ि गइला से सगरी आर्थिक ढांचा बदलि गइल अउरी देखत-देखत खेती-बारी बेकारी के उदाहरन बनि गइल। एह तरे धीरे-धीरे वर्ष प्रतिपदा आपन महता खोवत चलि गइल अउरी आज जे ई कहीं थोरी बहुत जियत बे तऽ नवरात के जूड़ल धार्मिक आस्था के कारन।
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नोचत बकोटत
सिहासन तक पहुँची 
कतनो कहुंचावे केहू 
तनको जन कहुंची।



धर्म आ जात के
जपीं खूब माला
गरहा में जास बेरादर
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अंतरजाल के बजार मे बेजार भइल मनई। 
हर बार गूगल के शिकार भइल मनई॥ 
हर घरी टुकुर टुकुर वेभ के निहारत रहे 
छितिराइल वेभ मे बेकार भइल मनई॥

रक्तचाप बढ़ल जाता रोज रोज हिट नियन 
किडनी भी केहु से उधार लेही मनई॥ 
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आवा लइको तोहे देखाई बेईमानी बे-ईमान क,
नेता जी से सुसूक रहल जनता हिन्दुस्तान क॥

बड़-२ नेता बा ढुकल घोटालन के थरिया में,
जनता भुईयां छछनत बा ई घुमे लो करिया में।
देश-धरम क चिंता ना फिकिर बा सन्तान क,
नेता जी से सुसूक रहल जनता हिन्दुस्तान क॥
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मास्टर साहेब - ए खदेरन नहीं मानेगा का रे फेर बतिया रहा है किसी दिन दिमगवा खराब हुआ ना त मार के पीठ तुड़ देंगे....रोज बतियाता है खाली, उठो खारा होखो आ बताओ की आज का बतिया रहा है...
खदेरन - मस्सायेब हई छेदिया के बेटवा नु हमरा से बतियावेला मंगरुआ...
मास्टर साहेब - तमीज से बोलो नहीं त मार हुडा के घोघ फुला देंगे...बताओ का बतिया रहा है...
खदेरन - मस्सायेब इ कहता की पूरा दुनिया योग करता आ प्रधानोमंत्री योग करेले रोज सुबेरे-सुबेरे...हमनियो के कइल जाई बिहान से... दूका दूका..
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सेजिया सईंया मोर, सेजिया सईंया मोर, 
आवत में डर लागे।

घनन-घनन करे घुघुर,
पायल करे शोर, पायल करे शोर,
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जे बा दीहले रतन, बबुआ करिह जतन 
ई ह सोना ना माँटी मिलावे होई।
अइसन अनमोल धन, पवल मानुष के तन 
कर्ज बाटे त मन से चुकावे होई।।
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केशव मोहन पाण्डेय जी के कहानी संग्रह 'कठकरेज' में कुल्ह नौ गो कहानी बाड़ी सऽ हर कहानी केशव मोहन जी के गँवई जिनगी के समझ अउरी लगाव दूनू के देखावत बाड़ी। अपनी हर कहानी के हाथे-गोड़े केशव मोहन जी अलगा-अलगा बात कहे के परियास करत बानी।
ए संग्रह के नौ गो कहानी बाड़ी सऽ

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डॉ अशोक द्विवेदी जी के संपादन में बलिया से निकले भोजपुरी के दिशा बोध के पत्रिका 'पाती' के 79-80वां मार्च 2016 अंक आ गइल बा। ई अंक भोजपुरी भाषा-समाज आ लोक-संस्कृति पर विशेष बा।

संपादक - डॉ अशोक द्विवेदी
प्रबंध संपादक - प्रगत द्विवेदी
पृष्ट संख्या - 64
सहजोग राशि - रू 40
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गंगा प्रसाद 'अरूण' जी के संपादन में जमशेदपुर से निकले वाली पत्रिका लकीर के चौथका अंक आ गइल बा। ई अंक कबिता, कहानी अउरी लेखन से भरल बा।
संपादक - गंगा प्रसाद 'अरूण' 
प्रबंध संपादक - राजेश भोजपुरिया 
पृष्ट संख्या - 40
सहजोग राशि - रू 20
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 (05 अप्रैल 2016)

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