विविध

फगुआ, फगुआ ना रहल - लव कान्त सिंंह

जवना देश के हर बात में उत्सव बा, मेला बा, मौज-मस्ती बा, सामाजिक मेलजोल के संदेश बा, विज्ञान बा, शिक्षा बा, संस्कार बा, आ उत्सव मनावे के अलग-अलग तरीका बा ओह देश के नाम ह भारत। भारत के संस्कृति में त्योहारआ उत्सव केपुरनका समय से ही काफी महत्व रहल बा।प्रेम, एकता आ सद्भावना के भाव से भरल तीज-त्योहारके सम्बन्ध कौनों जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से ना होके समभाव से बा, इहे कारण बा कि भारत में मनावल जाए वाला त्योहार आ उत्सव के सब धर्मं के लोग आदर के साथ मिलजुल के मनावेलें।सभे जानेला कि भारत एगो कृषि प्रधान देश ह आ जब ई कृषि प्रधान ह त हर फसल के समय उत्सव मनबे करी। धान के रोपाई होखे चाहे गेहूं के कटाई हर समय के उत्सव के तरह मनावल जाला। अगर एह नजर से देखल जाव त जब गेहूं फूट के खूब तइयार हो जाला त किसान अपना मेंहनत के सफल होत देख उत्सव मनावेला जवना के फगुआ कहल जाला। एही से जरत सम्हत में गेहूं के दूगो बाल फेंके के नियम बा। फगुआ भारतीय समाज के एगो प्रमुख त्यौहार बा, जेकर लोग बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करेलें।

फागुन चढ़ते फिजा में नाया ताजगी के अहसास होखे लागेला। प्राकृति के हाव-भाव विस्तार सेकहल जाव त एह महीना के हावा-पानी, दिन-रात, सुबेर-सांझ, घाम-छांह सब ई अहसास करावे लागेला कि रंग-बिरंगी फगुआ आवे वाली बा।जोगिरा के आवाज सुनाई देवे लागेला, हवा में खुशबू तैरे लागेला। अइसन में बच्चा से बूढ़ तक में मस्ती छा जाला। हर परिवार में खुशी आ चुहल का वातावरण देखाई देवे लागेला। देश भर में बसन्त पंचमी के दिन से ही अबीर उठ जाला आ ओकरा बाद लोग अपना-अपना तरह से फगुआ मनावे लागेला। पूर्वांचल के लगभग हर गांव में बसन्त पंचमी के दिन ही ताल ठोका जाला आ ओही दिन से पंचायत भवन पर, मंदिर पर चाहे केहू के दुआर पर रोज सांझ के फगुआ गवाला। पूवांचल के फगुआ में उ सब चीज के समावेश बा जवन कि एगो उत्सव के महोत्सव बनावे खातिर खोजल जाला। फगुआ के सबसे खासियत ई रहे कि जब भी फगुआ गवाई त सबसे पहिले भगवान जी के गोहरावल जाई, जइसे- हरिहरनाथ बाबा हरिहर नाथ...सोनपुर में होरी खेले....अइसही राम जी के आ कृष्ण जी के भी फागुआ गवाई, ओकरा बादे दोसर फगुआ गवाई। तब के फगुआ गीत में राग-विहाग, सुर लय ताल, साहित्य, विनम्रता, सौम्यता आ संस्कारित संदेश रहत रहेे, बाकी अफसोस कि अब अइसन नइखे। फगुआ के मीठ-मीठ सब गीत के स्थान ले लेल बा अश्लील आ द्विअर्थी गाना। कहल जाव कि फगुआ आज अश्लीलता का पर्याय बन गइल बा त गलत ना होई। आज के बदलत परिवेश में संस्कारित फगुआ गीत के मस्ती के सागर में अश्लीलता आ फूहड़ता का अइसन प्रदूषण फइल गइल बा कि एकरा से समाज के प्रबुद्ध वर्ग मर्माहत बा। 

देवर-भउजाई के एगो अइसन रिश्ता बा जेकर चर्चा कइला बिना फगुआ के चर्चा पुरा ना कहाई।पहले फगुआ गीत में देवर-भउजाईके संवाद अइसन होखे -‘‘अखियां त हउवे जैसे ठाकुर जी बुझालें नकिया सुगनवा के ठोर, अस मन करेला की छर देना छींट देतीं, लेइ लेत बबुआ बटोर’’ओहीजा आज के गीत बा ‘‘धीरे से रंगवा डालू रे देवरा भीतरा लगेला पाला रे’’ इ त अभी हम मयर्दे में बानी ना त आजकल के चवनिया गायक लोग सलाई रिंच से खोलऽता। अइसन गीत लिखे वाला आ गावे वाला जेतना दोषी बा ओसे बेसी दोषी बा अइन गीत सुनेवाला। ई सब बात खाली गीत-गवनई तक ही सीमित नइखे असल में भी इहे होता। ना देवर भउजाई के चिन्हता आ ना भउजाई देवर के जबकि हमनी के संस्कार ई ह कि सबेरे जवना भउजाई पर रंग फेंक के रंगेनी स सांझ के ओही भउजाई के गोर पर अबीर रख के आशीर्वाद लेवेनी स। अब ई सब परम्परा मेटा रहल बा जवन कि हर लेहाज से चिन्ता के विषय ह। ऐतने नापहिले जवन रंग के इस्तेमाल होत रहे उ प्राकृतिक चीज से बने जइसे फुल, हरदी, ध्निया इत्यादि ऐकरा पीछे वैज्ञानिक कारण भी बा कि मौसम बदले के समय चमरा कि रक्षा होला। आजकल सब रंग-अबीर रासायनिक पदार्थ से बनऽता जवन कि फायदा करे के जगहा पर नुकसाने जादा करत बा। ई त कुछ नइखे जवन सबसे जादा चिन्ता के बात बा उ ई कि अब लोग फगुआ के मतलब शराब बना के रख देले बा। इहे शराब के कारण गांव-जवार में तरह-तरह के घटना होता, जगह-जगह मारपीट होता जवना के कारण बहुत लोग अब फगुआ से दुरी बनावे लागल बारें जवन कि हमनी के संस्कृति खातिर बहुत घातक बा। ओहू से घातक ई बा कि लोकसंगीत के जगह अब गंदा-गंदा गाना बजा के दारू के निशा में धूत लइका सब हुड़दंग करत बारन स आ दोसरा के माई-बहिन पर ओल-बोल मारत बारन स जवना के कारण हर गांव में केहू के केहू से मारपीट होता, खान-पीयान छुटत बा त जवन परब एकता के संदेश देवे खातिर बनावल गइल रहे उ अब दूरी बनावे के काम करत बा।फगुआ परब के पीछे तमाम धार्मिक मान्यता, मिथक, परम्पराआ ऐतिहासिक घटना छुपलहोखे बाकी अंततःएह परब के उद्देश्य मानव कल्याण ही बा। हालाकि अंत में ऐतने कहे के चाहब कि बदलाव अगर सकारात्मक होखे त विकास होला बाकी जब बदलाव नकारात्मक होई त सत्यानाश के अलावा आउर कुछ ना होई।

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लव कान्त सिंंह
9643004592











अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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