संपादकीय

दूगो कबिता - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

ब्रह्मास्त्र

देखाता कूल्ही
बुझाता कूल्ही
हम दू आउर दू 
पाँच कहिलें 
मन के मरजी बा। 

शस्त्र जीभिए हव 
संविधान ब्रह्मास्त्र 
हर जगों चली
बुरी भली 
खुद गरजी बा। 

अंगना सून रहल 
जयचंद के अगवानी से 
कुल्हि अछूत भयल
पृथ्वीराज के पाती से 
कहेन सब फरजी बा। 

अर्थ विस्तार 
कबों ना होई 
शब्द संकोच 
चली हर जगहा 
दुनिया बेदरदी बा। 

कइसन पंथ
भा कइसन शिक्षा 
एसे त भल अशिक्षा 
देश से ईष्या?
उलट हमार अरजी बा। 
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झूठ के झउवा 

झूठ के झउवा 
ढोआता 
लोर आखीं के 
नाही पोंछाता 
उनका हाथे जबले डोर 
मासूमे पिसाता। 

का का लिखीं 
काहें लिखीं 
कइसे लिखीं 
चमचन के राज में 
बिगड़ल साज में
न संगीते समाता। 

राग कवन 
साज कवन 
बजनीहार कूल्हे नवहा 
ताल बेताल संग 
सुर ताल मिलल बा 
कवन धुन गवाता।
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लेखक परिचय:-

मैनेजिग एडिटर (वेव) भोजपुरी पंचायत
बेवसाय: इंजीनियरिंग स्नातक कम्पुटर व्यापार मे सेवा
संपर्क सूत्र: 
सी-39 ,सेक्टर – 3 
चिरंजीव विहार, गाजियावाद (उ. प्र.) 
फोन : 9999614657
अंक - 70 (8 मार्च 2016)

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