संपादकीय

छोड़ऽ छोड़ऽ कलइया

छोड़ऽ छोड़ऽ कलइया सइयाँ भोर हो गइल 
तनि ताक ना अँगनवाँऽ अँजोर हो गइल। 

गते गते घरवाऽ के, लोग सब जागल 
बोलेले चुचुहियाऽऽ, पह बाटे फाटल 
सुनऽ कुकड़ू कू मुरगा के शोर हो गइल। 
छोड़ऽ छोड़ऽ .... 

सुतलऽ न सुत्ते दिहलऽ, बीतल रइनिया 
हमरा त गोड़वा में, पऽरल झिझिनियाँ 
थोरे थोरे दरद पोरे पोर हो गइल। 
छोड़ऽ छोड़ऽ .... 

अब जनि राजा जी तू करऽ सरहँगई 
मन भरि कइ ले ले, बाड़ऽ दबंगई 
बड़ा भारत पिरितिया ल शोर हो गइल। 
छोड़ऽ छोड़ऽ ....
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अज्ञात 
अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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