संपादकीय

आवऽ खेती कईल जाव - अभिषेक यादव

चईत से लेके फ़ाग तक
जिनगी में सभ राग तक,
पनघट, ढेंकुल, मटका-मटकी
कालिदास से घाघ तक;
अतने मन में धइल जाव
आवऽ खेती कईल जाव।

मेंड़ से कच्चा मकान तक
मडई, टाटी, पलान तक,
ठहरी-ठहरी, डेगे-डेगे
भोजपुरियन के शान तक;
एकजुट में भइल जाव
आवऽ खेती कईल जाव।

अमोला से आम तक
बचवा से पुरान तक,
सीख रहल बा गते-गते
ऊसर माटी सिवान तक;
हरियाली सभ कइल जाव
आवऽ खेती कईल जाव।

पत्र-पाती से फून तक
खेत के हर ओ कून तक,
गाय-गोरु के चरवाही में
बीतल हर एक जून तक;
चैति, फगुआ गाइल जाव
आवऽ खेती कईल जाव।

ओका-बोका से नेट तक
पहुनाई से भेंट तक,
शिक्षा, बिजली आउर गरीबी
आला-अफसर के चेत तक;
उजियारा सभ फईल जाव
आवऽ खेती कईल जाव।
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अभिषेक यादव











अंक - 70 (8 मार्च 2016)

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