विविध

अंक - 73 (29 मार्च 2016)

कहल जाला कि जेके इतिहास ना इयाद रखेला ओके साहित्य इयाद राखेला अउरी जेके ई दूनू भूला देला ओके लोक इयाद राखेला। 29 मार्च 1857 के दिने मंगल पांडे बैरकपुर में अंग्रेजन के खिलाफ आपन मोर्चा खोललन जेवन 1857 के किरान्ती में बदल गइल। बाकिर एह काम खाती मंगल पांडे के 8 अप्रैल के सजायो मिलल। 
1857 के किरान्ती का इतिहास, का साहित्य भा का लोक सभकरा मन में समा गइल बाकिर जे एह किरान्ती के बिगुल बजावल ओके लगभग सभ केहू भूला दिहल। मंगल पांडे इतिहास के किताबन में दू लाइन के जोगदान बा अउरी साहित्य में सायद एतनो के नइखे। हँ लोक जरूर इयाद रखले बा। जब इतिहास अउरी साहित्य से सवाल पूछला तऽ जवाब ई मिलेला कि मंगल पांडे के जोगदान बटले का बा। ऊ ई काम आ तऽ भांग के नासा में कइले भा धरम बचावे खाती कइले। हो सकेला ई बात सही होखे अउरी हो सकेला कि एह बातन में केवनो दम ना होखे। बाकिर हमार सवाल एसे अलगा बा। 
का कारन रहे कि ओह बेरा हर जाति अउरी धरम के लोग अंग्रेजन के चाकरी करे खाती मजबूर हो गइल रहलें जब कि ऊ लोग ई जानत रहलें कि ऊ ई कऽ के अंग्रेजन के बरिआर कर रहल बाड़े? जदि एह सवाल के जवाब खोजल जाओ तऽ एतना तऽ एकदम साफ-साफ लउकत बा कि कम्पनी सरकार अपनी चाल्हाकी अउरी कारस्तानी से एह देस के सगरी सामाजिक अउरी आर्थिक बेवस्था के चउपट कऽ देले रहे। जब केवनो समाज कऽ सामाजिक अउरी आर्थिक बेवस्था चउपट हो जाला तऽ लोग मजबूर हो जाला अउरी पेट जियाबे खाती जेवने मिलेला तेवने काम करे लागेला। एही संदर्भ में मंगल पांडे के देखल जाओ तऽ ई साफ बा कि मंगल पांडे बड़ी मजबूरी में फउज के नोकरी करे खाती तइआर होखल होईहें। अउरी ई खाली मंगल पांडे कऽ अकेला सच नइखे बाकिर पूरा समाज कऽ रहल जब ओह घरी कऽ सगरी मरजादा टूट गइल रहे। मंगल पांडे जब विरोध कइलें तब ऊ जानत होइहें कि ऊ ना खाली आपन जिनगी कऽ खतरा में डालत बाडे बाकिर अपनी परिवार कऽ जिनगी अउरी पेट दूनू पर लात मारत बाडे। ओह बेरा ओही लोगन के जिनगी अउरी पेट पर लात मारत रहलें जेकरा खाती फउज में गइलें। ई बहुत मुसकिल बाकिर एगो बरिआर निरनय होला केवनो आदिमी खाती। एतने काफी बा ओह आदिमी कऽ चाल अउरी चरित्तर बतावे खाती। बाकिर ऊ चाल अउरी चरित्तर आज के आजाद हवा में कहीं भूला गइल बा।

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डॉ जनार्दन सिंह के लिखल परसतुत लेख भोजपुरिया इलाका कऽ सामाजिक अउरी आर्थिक दासा के बतावत ओकर सामाजिक अउरी आर्थिक विकास कऽ बारे आपन देले बानी।





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बकरी बेच, भइल बियाह खेदारु काका के,
आज़ादी से पहिले इनका घर ना रहे पाका के

घर ना रहे पाका के ऐहि से होखे सकेता;
नावा-नहर कनिया के सभे झांक लेता।

सभे झांक लेता, इज्जत का अब रही?
काका के मन-मथऽता अब केसे हम कहीं?
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कोइली क कुंहूंक परान कुंहूकावे 
ननदी के बोलिया नचिकों न भावे 
तलफेला हिया के मचान सँवरो। 
कहिया बीती पियवा संगे विहान सँवरो।

तीसिया फुलाइल सरसो के संगवा 
महुवा ढिठाईल पीराला मोर अंगवा 
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सूप भरि रूप के
सनूख भरि सोहुआ में
सानल सनेहिया सलोर
आन अवरू अपना के
नेह-नाता गरगट
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देश के पहिलका स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी बलिया के मंगल पाण्डे के बगावत अंगरेजन के कँपा दिहले रहुवे. मंगल पाण्डेय के सैनिक कोर्ट से दू गो अंगरेज अफसरन के हत्या आ सेना से बगावत का आरोप में फाँसी के सजाय दिहल गइल. फाँसी के तारीख कोर्ट तय कइले रहे १८ अप्रेल १८५७ बाकिर उनका बगावत से डेराइल अंगरेज उनका के तय तारीख से दस दिन पहिलही चुपे चोरी फाँसी पर लटका दिहलें. अलगा बात बा कि उनकर ई चालबाजी कवनो कामे ना आइल. अपना प्रान के आहुति दे के मंगल पाण्डे जवन चिंगारी जरवलन तवना का आग में ईस्ट इण्डिया कंपनी के हुकूमत देखते देखत राख होखे ललागल. एह वीर बाँकुड़ा मंगल पाण्डे के जन्म, उत्तर-प्रदेश का पूर्वाचल के बागी जिला बलिया के नगवां गांव में भइल रहे. अंगरेजन का फौज के ३४वां नेटिव इन्फेण्ट्री के सिपाही का रुप में उनकर नम्बर रहुवे १४४६. 
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जब सन्ताबनि के रारि भइलि, बीरन के बीर पुकार भइलि।
बलिया का ‘मंगल पांडे के, बलिबेदी से ललकार भइलि ॥1॥

‘मंगल‘ मस्ती में चूर चलल, पहिला बागी मसहूर चलल।
गोरन का पलटनि का आगे, बलिया के बाँका शूर चलल ॥2॥

गोली के तुरत निसान भइल, जननी के भेंट परान भइल।
आजादी का बलिवेदी पर, ‘मंगल पांडे‘ बलिदान भइल ॥3॥
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जब-जब देसवा पर
परली बिपतिया
मोर सिपाही हो, जिया के तूँही रखवार
बाप-महतारी तेजलऽ
तेजलऽ जियावा
मोर सिपाही हो, तेजल तूँ घरवा-दुआर।
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हमहूँ सपना देखेनी
सपनवे ओढ़ेनी
सपनवे बिछावेनी,
पेट के क्षुब्धा
सपनवे से मेटावेनी।
सपने से चलत सँसरी बा
जेकरा लगे सपना नइखे
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