संपादकीय

तोरे बदे - तेग अली-तेग

हम खर मिटाव कैली हा रहिला चबाय के
भेंवल धरल बा दुध मे खाजा तोरे बदे॥
अपने के लोई लेहली है कमरी भी बा धइल
किनली ह रजा , लाल दुसाला तोरे बदे॥
पारस मिलल बा बीच मे गंगा के रामधै
सजवा देइला सोने के बंगला तोरे बदे॥
अत्तर तु मल के रोज नहाईल कर रजा
बीसन भरल धइल बा करावा तोरे बदे॥
जानीला आजकल मे झनाझन चली रजा
लाठी लोहांगी , खंजर अउर बिछुआ तोरे बदे॥
बुलबुल , बटेर , लाल लडावैलै टुकडहा
हम काबुली मंगवली ह मेढा तोरे बदै॥ 
कासी पराग द्वारिका मथुरा अउरी बृन्दाबन
धावल करैले 'तेग ' " कन्हैया " तोरे बदे॥
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अंक - 66 (9 फरवरी 2016)

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