संपादकीय

परलय काल - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

माया के फेरा में प्रानी, 
नित नित करे बवाल, 
पुण्य धरम सब भूल गईल बा, 
पापी हो गईल काल। 

पापी हो गईल काल, 
काल में बचल बा एक सवाल, 
सवाल यहि अब आगे का बा, 
कइसे सुधरी ईऽ मायाजाल। 

कहे अभय कविराय कि 
अब तऽ हो गईल जी के जंजाल, 
करम जुटाईं आपन सबे कोई, 
अब तऽ आई परलय काल।
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 67 (16 फरवरी 2016)

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