संपादकीय

मुजरा - जनकदेव जनक

हम डीएन हाई स्कूल जनता बाजार से बदली करा के भगवानपुर हाई स्कूल में आ गइल रही. इहां छात्र छात्रन के बीच खुश रही. एक महीना कइसे बीत गइल ,हमरा कुछो ना पता चल पावल. स्कूल का अनुशासित वातावरण अच्छा लागल. नया मास्टर के प्रति विद्यार्थियन के मधुर संबंध आ अज्ञाकारी सुवभाव मन भावन लागल. स्कूल के अचार बेवहार पर मह निहाल रहीं. गुरू चेला के बीच अनूठा स्नेह आ पियार देख के स्कूल के हेडमास्टर शंकद दयाल ठाकुर प्रसन्न रहीं. 
जाड़ा के मउसम रहे. आसमान में बदरी घेरले रहे. एही बीच कभी -कभी पछिया हवा तेज हो जाव. जेकरा कारण रह रह के देह हाथ में कंप कंपी समा जाव. तीर खानी चुभत ठंढा बेयार के सामना कोट आ स्वीटर ना कर पावे. एही से सभे जड़ा के गुलाबी घाम के इंतजार में टकटकी लगवले रहे. एका एक बादरन से लुका छिपी खेलत सूरृरूज भगवान झंकलें. घाम उगत देख के मैदान में खेलत छोट छोट लइकन आपन हाथ जोड़ा के नाचे लगले आएक स्वर में आपन कोरस अलापे लगले.....
रामजी रामजी घाम कर 
सुगवा सलाम कर, 
तोहरा बालकवा के जोड़ लागता
पुअरा फूकी फूंकी बाड़ें सभे तापत....
स्कूल के फुलवारी में कुरसी लाग गइल.हेडमास्टर साहब के साथे स्कूल के मास्टर लोग बइठल रहे आ जड़ा के मजा लेत रहे. तभीये साइकिल पर सवार होके 14-15 गो लइका अइलें. आपन आपन साइकिल स्टैंड पर खड़ा करके हमरा के प्रणाम कइलें. ओह लोग के देख के हेडमास्टर साहब एसडी ठाकुर पूछ बइठनी,
‘तू लोग कहवां से आवत बाड़? कुछों काम बाटे का? ’
‘ सर, सर ....‘ एगो लइका कुछ कहे के चहलस. 
‘हां-हां बोल, केकरा से काम बाटे? मैट्रिक के फारम भरवाये के बाटे का? ’
‘ना सर, हमनी के अभय दुबे जी के पुरान छात्र हईस. डीएन हाई स्कूल जनता बाजार से आइल बानीस. ’
‘अच्छा, दुबेजी के चेला हउव लोग. तोहरा लोगिन के गुरू भक्ति देख के मन खुश हो गइल. के कहत बाटे कि आज काल्ह गुरु चेला के संबंध खराब हो रहल बा. तोहरा सभ के बढ़िया बेवहार देख के मन अघा गइल. अच्छ , दुबे जी से बात कर लोग . हम आपन क्लास कके आवत बानी. तोहरे नीयर लोग अपना जिनगी मेें तरक्की आ प्रगति करेला. ’ एतना बोल के हेडमास्टर साहब अपना क्लास के तरफ बढ़ गइनी. 
हेडमास्टर साहब के गइला के बात डबडबाइल आंख से राजेश हमारा के देखलस आ धधा के हमरा गोड़ पर गिर पड़ल आ गोड़ पकड़ लेलस. ओकरा आंखी से टप टप लोर चुए लागल. उ एकाएक रोअत बोल पड़ल.‘ सर, हमरा के माफ कर दीहीं. रअरा साथे हम बहुते बड़हन गलती कर देले रहीं.’
‘ हां सर, राजेश के माफ कर दीहीं, अनुशासनहीनता के आरोप में ई स्कूल से निकाल दिहल गइल बाड़ें. राउर मदद ना मिली त ई मैौट्रिक के परीक्षो ना दे पइहें.’
‘अरे राजेश उठ उठ, नेक काम में देर होला, अन्हेर ना होला. तोहार भविष्य उज्जवल बाटे. आरे काहे रोअत बाड़. देर से अइल-अ बाकिर दुरूस्त अइल-अ. ’ हम राजेश के उठावत कहनी. 
‘सर,हमरा दुख बाटे कि हमरे कारन रउरा बदली करा के इहवां आ गइनी. अब वापस लवट चलीं. हमनी के आग्रह करे आइल बानीस!‘ राजेश आपन लोर पोछत कहलस. 
‘ आ रे रे , अइसन बात नइखें, हम निजी कारन से बदली करवले बानी. तोहरा लोग के इच्छा बाटे त हम फेरू ओहीजा आवे के कोशिश करब. ’
विद्यार्थियन के वापस लवट गइला के बाद हमरा मन भावना के सागर में डूब गइल. हमरा साथे कइल राजेश के दुरबेवहार एकाएक दमाग में उभरे लागल. हम अपना स्कूल के कार्यालय में बइठल विद्यार्थियन के कॉपी जांचत रही. ओही समय स्कूल के चपरासी मंटू अंदर घुसल आ बोललस,‘ सर, रउरा से केहूं मिले के चाहत बाटे. ’
‘अच्छा, अंदर भेज द. ’ कॉपी जांचत हम बोलनी. 
‘नस्कार दुबेजी!’
‘नमस्कार नमस्कार!’ जानल पहचानल आवाज सुनके आपन नजर कापी से हटा के सामने देखनी. भगवान पुर हाट के लछुमन तिवरी जी रही. जे चक चक धोती कुरता के ऊपर करिया बंडी पहिरले खड़ा रहीं. उहां के कान्हा पर लाल टेस चेकदार गमछाो रहे. जवन एकदम झकास लागत रहे. 
‘आरे तिवारी जी , आई आई . एने के राहता कइसे भूल गइनी ह . कुरसी पर बइठीं.’ हम तिवारी जी के देखते उठ के खड़ा हो गइनी आ उहां के बइठे खातिर निहारा कइनी. 
‘ का बताई दुबे जी, बड़ लड़का रमेश बाबू के शादी के दिन ठीक हो गइल बाटे. नाच-शामियाना, टेंटे बैंड बाजा, डोली -पालकी, हाथी घोड़ा के साटा बायना बांधे खातिर जेने तेने बंवड़ेरा नियर नाचत फिरत बानी. सुननी ह कि जनता बाजार में गिरि बाबा के नाच बड़ा बढि़या बाटे. रउरा चलीं, तानी साटा बंधवा दीही.’
‘ आरे तिवारी जी , हमरा के साटा बायना के चक्कर में काहे के डालत बानी. हम सीधा सादा आदमी , भला नाच के हाल का जानी. हमार सलाह मानी त जनता बाजार के थानेदार डीएन पांडेय के पास चलीं. उहवां से भेट हो जाई तो समझी आम के आम आ गुठनी के दाम मिल जाई. 
‘रउरा का कहे के चाहत बानी, हमरा समझ में नइखे आवत. ’ लछुमन तिवारी अनजान व्यक्ति नियर बोल पड़नी.
‘हमार मतलब बा कि महंगा नाच सस्ता में पट जाई आउर तबला के तल पर दु चार गो रउरा मुजरो सुन लेहब.’
‘आरे बाह दुबे जी, रउरा त हमरा मन के बात छीन लिहनी ह. चलीं, दरोगा बाबू से मिलल जाये.’
स्कूल के अंतिम घंटी बाजल, दसवां वर्ग में हमार हिंदी के क्लास रहे. अचानक तिवारी जी के आ गइला से हमरा ऊ घंटी छोड़े के पड़ल. स्कूल के हेडमासेटर एसडी ठाकुर से छुट्टी लेके हम तिवारी जी के साथे बाहर निकल पड़नी.’
लछुमन तिवारी भगवानपुर हाट के इज्जतदार आदमी रहीं. सामाजिक काम में बढ़ चढ़ के हिस्सा लिंहीं. चाहे केहूं गरीब के बेटी के शादी- बिआह होखो, चाहे कवनों बेराम आदमी के सेवा टहल. जतना बन सकेला, सभ के ऊ तन मन धन से मदद करत रहीला. 
हम तिवारी जी के साथे गप शप करत थाना पगुंच गइनीं. एगो सिपाही से पूछला पर मालूम भइल कि दरोगा जी कतहीं छापामारी करे गइल बानीं. बाकिर हमरा समझ में ना आइल कि रात के छोड़ के शाम के दरोगा जी कवना छापेमारी में निकल बानी? खैंर, हम तिवारी जी के लेले टेलीफोन एक्सचैंज ऑफिस पहुंचनी. ओकरे पीछे गिरी बाबा के नाच घर रहे. 
एगाो बड़हन हॉल में नाच गान के महफिल सजल रहे. गांव जवार के मुंहगर लोग मस्ती के चासनी लूटे खातिर जुट रहे. एमें गांव के मुखिया, सरपंच, डॉक्टर, वकील, बाजार के बेयपारी आउर थाना के दरोगा डीएन पांडेय आदि आपन आपन आसन जमवले रहीं लोग. केहूं पीकदानी में पूच पूच मगहिया पान खाके थूकत रहे. केहूं पियाली के पियाली जाम के पैमाना छलकावत रहे. एही समय अचानक लछुमन तिवारी महिफिल में टपक पड़लें. जान पहचान के लोग खड़ा होके उनुका के सुआगत कइलस. बड़ आसामी पाके नाचवाला गिरी जी फूले ना समास. लछुमन तिवारी के केने उठाई आ केने बइठाई में लागल रहस. कवना तरे उनुकर खातिरदारीकरी कि उनुकर दिल दरिआव हो जाव. बाद में दरोगा जी से परिचय करवले, ओकरा बाद उहां के बगल बइठ के आसन मिलल. 
बइठला के बाद हम साटा वाला बात दरोगा जी के बता दिहनी कि तिवारी जी अपना बेटा के शादी में गिरी बाबा के नाच ले जाये के चाहत बानी. दरोगा जी अबही कुछो बोलहीं के रही तले, पीछे पीछे परछाई नियर मेड़ड़ात गिरी बाबा बोल पड़लें
‘रउरा निफिकिर रहीं तिवारी जी, जरूर नाचब रउरा बेटा के बिआह में, बाकिर कवना तिथि के कवना गांव में बारात जाई. कम से कम दुलहिन के बाबुजी के नाम त लिखा दीहीं. हम उहां के दुआर आ गांव के शोभा जरूर बढ़ाइब. ’ खुशी में नाचत गिरी बाबा बोल पड़लें. 
‘रउरा महफिल में आ गइनीं, समझी कि बसंत गिरि के नाच बंधा गइल. दरोगा जी समुझावत कहनी. ,’अब बनारस के लाजवंती आ कोलकाता के मुक्ता रानी के ठूमका पर मुजरा के माजा लूटीं. ’ दरोगा जी ठिठोली करत कहनी. दरोगा की के एह बात से महफिल में जोरदार ठहाका लागल. तिवारी जी मुसकी छोड़त नाच देखे लागलें. 
‘ रात छोड़ गइल हो राजा सुतले सेजरिया पर ....’ कमसीन मुक्तारानी के मिश्री घोलत स्वर लहरी पर सभे लोग मस्त रहे. लाजवंती नियर छुई मुई खूबसूरत नचनिया के लाजबाव अदाकारी , महफिल में नया जान फूंक दिहलस. मुक्तारानी के एक एक ठूमका आ मुजरा के बोल पर सभ लट्टू भइल रहे. अचानक मुक्ता रानीकुल्हा मटकावत नागिन लेखा कमर लचकावत दरोगा के सामने बइठ गइली. दरोगा जी के आंखी में आंख डाल के कुछो इशारा से कहनी. दरोगा जी उनुका अदाकारी पर फिदा हो गइले आ जेब से एक हजार के एगो नोट निकाल के मुक्ता के चोली में खोंस दिहले आ तिवारी जी के ओर इशारा करत मुक्ता के कान में कुछ फुसफुसइले. लछुमन तिवारी नर्तकी मुक्ता के रूप रंग आ मस्तानी चाल पर मंत्र मुग्ध रहनीं. ओकरा सुघड़ सुडौल मांसल देह पर डींठ गड़वले, घुटना तक लहरात लहंगा के निहारत रहीं, कांच कोइन नियर लप लपात कमर, गोटेदार चोली में कसमसात बंद जोबना आ मुक्तारानी के तिरछी नजर पर सभे घायल रहे. एकाएक मुक्ता अपना घूंघटा के दुनू छोर छतरी लेखा अपना सिंर के ऊपर तान लिहली आ नागिन खानी कमर लचकावत तिवारी जी के तरफ चल पड़ली. एकाएक बासंती झोंका नियर ऊ लछुमन तिवारी के छोड़ के आपन घूंघटा हमरा ऊपर ओढ़ा दिहली आ मुसकात बोल उठली, ‘ छन भंगुर जिनगी में जी भर के माजा लूट ल राजा जी! फिर मउका ना मिली.’ 
मुक्ता के एह हरकत पर एका एक हम सकपका गइनीं. मारे शरम के हमार जियरा तार तार हो गइल. समझ में ना आइल का कहीं. एका एककंठ में माघ के पाला मार देहलस. दम घुटे लागल. 
हमार विचित्र दशा देख के महफिल में जोरदार ठहाका लागल. दरशक लोग मारे खुशी के लोट पोट हो गइल. बाकिर तिवारी जी हमरा मन के भावना समझ गइलनीं आ झट से एक हजार के एगो लाल नोट निकाल के मुक्ता के तरफ बढ़ा दिहनीं. ऊ नोट के लपक लिहलस आ नाजो अदा के साथ शुक्रिया अदा करत उठ गइल. मुक्ता के गइला के बाद हम अपना के सहज करे के कोशिश कइनी. हमरा बुझात रहे क सभे नचनिया के छोड़ के हमरे के देखत बा. नाच घर के खिड़की आ दरवाजा खुलल रहे. जहां छुट्टी के बाद स्कूली लइका उहा खड़ा होके नाच हुक हुलक के देखत रहस. 
दुसरका दिन हम स्कूल गइनी. चउथी घंटी में वर्ग दसवां के लइकन के हम हिंदी पढ़ावत रहीं. बाकिर क्लास में शांति ना रहे. पीछे के सीट पर बइठल कुछ लइका जादही हल्ला गुल्ला करत रहस. जब हम डांट करी त थोड़ा देर खातिर शांति हो जाव. ओकरा बाद उहे दशा रहे. जब क्लास में शोर गुल फेरू होखे लागल त हम गुस्सा में चीख पड़नी,‘ अरे काहे शोर मचावत बाड़ लोग, कवनों बात बा का? 
‘हां सर...., हां सर...’ मनोज हकलात कुछ आउर कहे के चहलस. 
‘बोल का पूछे के बा?’हम आपन गुस्सा पिअत शांत लहजा में पूछनी. 
‘सर, राजेश रउरा से कुछ पूछे के चाहत बाड़ेंन?’
राजेश के नाम आवते क्लास में शांति छा गइल. ऊ अपना सीट से उठल आ हमरा तरफ कवनों छुट भइया गुंडा लेखा घुड़लस. ओकरा एह अशिष्ठता पर हमार मन आउर गुस्साये लागल. बाकिर ओह क्षेत्र के विधायक के लइका होखे के कारन हम मन मसोस के रह गइनीं आ पूछ बइठनी ,‘ बोल राजेश ,का पूछे के चाहत बाड़?’
‘सर, मुजरा के संधि-विच्छेद का होला?’ राजेश कुटील मुसकान के साथे पूछलस.
राजेश के अतना पूछला के साथे क्लास में जोरदार ठहाका लागल.
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लेखक परिचय:-

पता: सब्जी बगान लिलोरी पथरा झरिया,
पो. झरिया, जिला-धनबाद 
झारखंड (भारत) पिन 828111,
मो. 09431730244


अंक - 68 (23 फरवरी 2016)

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