संपादकीय

माईभाखा - प्रिंस रितुराज दुबे

मातृभाषा कह्तरी आपन बाथा
"का कही बाबु इऽ हऽ कलजुग के साम्राज्य
आपन आपन नईखे होत दोसर कवन लाल करी सम्मान 
फरका कऽ दिहले हमके ना करे इज्जत हामार 
निक लागल दोसर थरिया, खात नईखे केहू आपना में 
हिंदी हऽ भारत के राजभाषा उहो बनल अंग्रेजी 
कईसन इ कलजुगी सम्राज 
कब ईलो समरी कब बचाई 
जब हो जाई पूरा बिलाऽ 
हमार सुनी (कवि)''
माईभाखा हहुवे सबसे बड कऽ 
भोरपारा जन दिहऽ ज्ञान पाके 
होखी तोहर एहिसे बुलंद आवाज 
आपन भाखा आपने होला, इहे हऽ मय जिनगी कऽ बरदान|
माई के अचरा में जवन सिखलऽ 
उहे कहाई मातृभाषा 
तमिल होखे चाहे हो भोजपुरी होखे बंगाली , मराठी 
केहू बोले पंजाबी त केहू बोले गुजरती।
आपन भाखा कऽ इज्जत करऽ , एहिप करऽ अमल
रविन्द्र से लेके गाधी कईले आपन भाखा के सम्मान 
तनी समरऽ तनी बचा लऽ , इहे लहराई झंडा तोहर 
जहा ना होखे मईभाखा कऽ आदर
उहा होला अनपढ़ के पहचान 
पढ़ल लिखल सब भूसा के थरिया 
बुद्धिजीवी में ना होखी तोहर सम्मान 
महेंद्र मिसिर , भिखारी ठाकुर सुनीऽ लऽ नजरुल जी के बात 
धर्म से बड के होला बड़का करम माई आ भाखा कऽ सम्मान।
आपन भाखा के इस्तमाल करऽ 
खूब करऽ पढाई लिखाई 
चाहे लिख कैथी में चाहे देवनागरी 
कहे माने लिखल कर आपन भोजपुरी 
भोजपुरी हऽ वैदिक कालन कऽ भाषा 
कुछ तऽ कर वेद के सम्मान।
माई भाखा ना होखे कवनो धर्म कऽ 
होखे आदर हर जन जन में 
भोजपुरिया सनातन हऽ भोजपुरिया मुस्लिम 
भोजपुरिया ईसाई हऽ भोजपुरिया बुद्ध भा जैन।  
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लेखक परिचय:-

अंडाल, दूर्गापुर, पश्चिम बंगाल 
ई-मेल:- princerituraj@live.com
मो:- 9851605808
अंक - 68 (23 फरवरी 2016)

2 टिप्‍पणियां:

  1. कविता लिखल मोसकिल काम बा बाकिर कबिता के लिखनिहार भेड़ियाधसान बा लोग।
    ई कविता बतकही खानी हो गइल बा।कविता के फॉर्मेट के जाने-समझे के पड़ी।हम खाली एह कविता ले बात नइखी करत।भोजपूरी में जादेतर अतुकांत कविता में भसनबाजी लउकेला।कलात्मकता आ कसावट के कमी सोझे लउकेला।

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    1. बात राउर सही बा। बडी मुश्किल हाल बा भोजपुरी साहित्य जगत कऽ।

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