संपादकीय

बारह प्रकार के बिआह - धरीक्षण मिश्र

पैशाच बिआह: (दुर्मिल सवैया 8 सगण)

युवती रहे सूतलि मातलि या कतहीं जो अकेल अचेत मिले।
उहवें करि भंग कुमारता के चुपके से चोराइ के भागि चले।
पछिमोतर में एक जाति पिशाच में ईहे रिवाज रहे छवले।
अतएव पिशाच बिआह इहे अधमाधम में सब से पहिले॥

राक्षस बिआह: (शूर, भ म स त य ग ल) (5,5,7)

ढोल बजा के सम्मुख आ के सैनिक ले के साथ।
मारि गिरावे जे चलि आवे रोकत ओ के हाथ।
माथ ठेठावे लोर गिरावे ऐसन ले जा नारि।
मोह न लोग छोह न लोग रक्षक के संहारि

(तोटक 4 स गण)
युग ऐसन एक रहे पहिले रण में जब दुइ दल आइ मिले।
विजयी दल दे तब लूट मचा लड़िकी धन ऐसन लूटलि जा।
बरियाति हवे अवशेष उहे सब रोब उहे सब वेष उहे।
अबहीं तक लीक पिटात हवे पहिले अस किन्तु न बात हवे

(तोमर 12 मात्रा l)
राक्षस बियाह प्रकार में भइल एक सुधार।
सहमति बधू के पाइ वर चलें सेन सजाइ।

(मालिनी न न म य य ; 8,7)
अइसन बर जोरी राक्षसी रीति वाली।
मनु उचित बतौले क्षत्रिये जाति पाली।
निमहल बिधि इहो क्षत्रिये राज पा के।
लउकत कतहीं ना बाद संयोगिता के।

गान्धर्व बिआह: (विद्युन्माला ; म म ग ग)

पूछे ना माई बापे से बेटा बेटी जो आपे से।
राजी हो जा ले आजादी ऊ होला गन्धर्वे सादी।
दूँनू हो रूपे के लोभी ओही से ई सादी सोभी।
रूपे देंही के जो खोयी ईहो सादी फीका होयी।
केहू एके माने ठीके केहू ई ना माने नीके।
राजा चाहें क्षत्री लोगे ए सादी के प्राय: भोगे

आसुर बिआह: (धारि र ल)

मोल भाव से पटाव देत दाम सिद्ध काम।

(लक्ष्मीधर 4 र ग ण)
दाम का जोर से कीनि के नारि के।
व्याहि ले आसुरी में बिना रारि के।
बूढ़ का मूढ़ का मौर के आसरा।
व्याह के ढ़ंग ई देत बाटे धरा

प्राजापत्य बिआह: ( समानिका, र ज ग)

कामना उठे मने। गेह में प्रजा जने।
कन्यका पिता जहाँ। जाइके बरे उहाँ।
याचना स्वयं करे। बाप शर्त ई धरे।
हाथ बीच हाथ हो। धर्म साथ-साथ हो।
लेन देन ना रती। रीति ह प्रजापती।
बालिगे बने ब्रती। एक रूप दम्पती।

आर्ष बिआह: (विद्याधारी, 4 म)

कन्या के बापे जेमें जोड़ा गौ पावे।
राखे ना शादी भैले ऊहो लौटावे।
विप्रे विद्याधारी का साथे में खाली।
देखे में आवे ई आर्षो वाली चाली।

दैव बिआह: (सेवा ; त र स ल)

यज्ञीय कार्य में जजमान। जे के रखे पुरोहित मान।
कन्या मिले पुरोहित हाथ। दैवे उहे बियाह अनाथ।
अइसन हो जब यज्ञ विधान। कन्या यज्ञ दक्षिणा मान।
उपरोहित के दीहल जात। ऊहे दैव बिआह कहात।

ब्राह्म बिआह: (दान, भ स ज स)

सादर वर के बुलाई करि के। मंत्र निगम के संगे उचरि के।
सौंपल लड़की सुयोग्य वर के। ब्राह्म चलन बा कुलीन घर के।

(कन्या; म ग)
लोटा थारी सीधा बारी लूगा बीखो भावी सीखो 
साथे सेजो दे के भेजो। सन्ती नाहीं धेला चाहीं।

गोलावट बिआह: (विनिमय)

लरिका कुँवारे बा परल पूछत न केहू जाति बा।
रुपया बिना लड़की सयानी ना कहीं बियहाति बा।
लड़िकी से लड़िकी बदलि के लड़िका बियाहल जात बा।
ई ह गोलावट निर्धनी में कबें कालि देखात बा।
भरसक बियाह न ए तरे के लोग इच्छा से करे।
ई तब करेला जब कि दोसर ना चलेला सरखरे।
अन्य रीति रिवाज एकर सजी ब्राह्म समान बा।
किन्तु जग का दृष्टि में एकर न ऊँच स्थान बा।
एही गोलावट के छ पोंछिया और एक प्रकार बा।
तीनि घर के तीनि कन्या तीनि बर के कार बा।
ई छ पोंछिया रीति बाटे कठिन कम विख्यात बा।
पर गोलावट से अधिक ई शुद्ध मानल जात बा।

 चलन्सार बिआह

बेटिहा रुपैया देत बाटे हृदय में दुख मानि के।
और बेटहा ढेर रुपया लेत बाटे ठानि के।
आज कल अइसन वियाहे के विशेष प्रचार बा।
नाँव एकर का रहो ई प्रश्‍न एक हमार बा।
देत लेत समधी दुओ जब विशेष भरि आह।
अब का युग के ठीक बा असली उहे बिआह।

बँड़इ बिआह 

भइला पर नेग समाप्त सजी बेटहा अबे चाहत बा किछु गारे।
बेटिहा अफनाइ के चाहत बा लड़की के करीं अब कैसो किनारे।
बर का सँग में कनियाँ करि देत बा भाँजि के लट्ठ धिराइ के मारे।
बर जोरी विदा बर जोरी करे त उहे बा कहात बिआह एगारे।

नंगई बिआह

बेटिहा का लाठी का डर से कनिया के बिदा करा कर के।
बीचे राहे में छोड़ि देत बिलकुल असहाय बना कर के।
बेटहा अइसन लोभी मिलि जा रुपये के केवल रहे चाह।
तब उहवें बारहवाँ प्रकार के होखेला कतहीं बिआह।
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अंक - 65 (2 फरवरी 2016)

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