संपादकीय

इहे बाबू-भइया - आचार्य महेन्द्र शास्त्री

धन के महातम हमेसा से बहुत बरिआर रहल बा। अउरी  हमेसा से समाज दूगो खाना में बंटाइल बा; बरिआर अउरी कमजोर। बरिआर हमेसा कमजोर के जोर से बरिआर भइल बा अउरी ओकरे दमे  मए सुख-सम्पदा के लाभ उठावेला जबकि ओहीजा कमजोर खइला बिना मुअत रहेला। इहे बँवारा देखावत आचार्य महेन्द्र शास्त्री के इह कबिता आपन बात कहत बे।


- राजीव उपाध्याय


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कमइया हमार चाट जाता, इहे बाबू-भइया।


जेकरा आगा जोंको फीका, अइसन ई कसइया
दूहल जाता खूनो जेकर, अ इसन हमनी गइया॥

अंडा-बाचा, मरद मेहर दिन-दिन भर खटैया
तेहू पर ना पेट भरे, चूस लेता च इँया॥

एकरा बाटे गद्दा-गद्दी, हमनी का चटइया
एकरा बाटे कोठा-कोठी, हमनी का मड़इया॥

जाड़ो ऊनी एकरा खातिर खाहूँ के मलइया
हमनी का रात भर खेलावेले जड़इया॥
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लेखक परिचय: -


नाम: आचार्य महेन्द्र शास्त्री जी 

जन्म: 16 अप्रैल 1901

निधन: 31 दिसंबर 1974

जनम अस्थान: रतनपुर, सारन (छपरा), बिहार

भोजपुरी औरी हिन्दी के साहित्यकार 

संस्कृत क बरिआर विद्वान

परमुख रचना: भकलोलवा, हिलोर, आज की आवाज, चोखपा
अंक - 61 (5 जनवरी 2016)

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