संपादकीय

चौबे गइले छब्बे बने - डा उमेशजी ओझा

जाने केतने काथा-कहानी हमनी के लोक में छितराइल बाड़ी सऽ अउरी काथा कहे अउरी सुने के परम्परा खतम हो गइला के कारन बिलात जात बाड़ी सऽ। एह बेरा ई जरूरी बा कि एह काथा-कहानी के सोझा ले आवल जाओ जेसे आवे आली पीढ़ियो के ओकरा से चिन्हकारू बनावल जा सके। डा उमेशजी ओझा जी बटोरल इह लोककथा 'चौबे गइले छब्बे बने' कइगो रुप में अलगा-अलगा पात्रनन के हाथे-गोड़े उत्तर भारत और भोजपुरिया इलाका में कहल-सुनल जाले। 


- राजीव उपाध्याय
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सबेरे- सबेरे गाँव के बहरी आपन बगइचा में नन्दू आम के फेड़ के जरी प बइठल दतुअन करत रहले. तबही देखत बाड़े कि गाँव के पंडीजी आपन हाथ में लोटा लेले उदास मन चलल आ रहल बाड़े. नियरा आवते नन्दू पंडीजी से पूछिये दिहले. “ पंडीजी गोड़ लागत बानी! अतना उदास काहे बुझात बानी?” 
पंडीजी आगे पीछे देखिके कुछ कहल चहले; बाकी तेजी से आगे बढ़त कहले, “रुक, नन्दू, पहिले हलुक होके आवेद.” 
‘बुझात बा पंडीजी के लगे कवनो बड़हन समस्या बा, रुके के चाही.’ सोचि के नन्दू फेड के जरी प बइठल पंडीजी के राह देखे लगलें. 
शिवपुर गाँव में पाहिले से एगो वैद मोलवी साहेब रहले. शिवपुर गाँव के आ ओह गाँव के अगल-बगल गाँव के लोग उनका लगे आपन बेमारी के देखावे खूब आवत रहले. मोलाबी साहेब उ लोग से ढेर पइसा लेट रहले. पंडीजी जब बैयदी पढ़ी के अइनी त उहोके आपन बैद्शाला खोल दिहली. बाकी उनकर दूकान ना चालत रहे. उ आपन दूकान में झंख मारत रहले. 
पंडीजी के आवते नन्दू आपन जगह से उठिके पंडीजी के लगे गइले. “का बात बा पंडीजी?” 
“अरे का कही नन्दू, कहतो ख़राब लागत बा, बाकी तहरा पूछे के कारण बतावत बानी. एक बारिस हो गइल. गाँव में दवाई बाटत. बाकी कवनो फायेदा नइखे होत. ओहिजे मोलाबी जी के दवाई कऽ दुकान खुबे चलत बा. अब बुझात बा कि दूकान बन कऽके शहर चली जाइ.” 
“बस पंडीजी अतने से घबरा गइनी. एह में सोचे का बा.? हमार बात मानी. एगो काम करी. छापा खाना जाइ, आ एगो परचा छपवाइ कि “हमारा किहे शर्तिया इलाज कइल जाला बेमारी ठीक ना भइला प १,००० रूपया वापस कइल जाइ.” 
“एह से का होई?” 
“पहिले छपवाइ त. ओकरा बाद हमारा से मिलब.” 
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पंडीजी परचा छापवा के आपन गाँव आ दोसरो गाँव में बटवा दिहले. परचा बाटते पंडीजी के दोकान में रोगी के देखावेवाला के भीड़ लाग गइल. पंडीजी के दूकान चल निकलल. रोजे खूब भीड़ लगेलागल. मोलबी साहेब के लगे एको आदमी ना जात रहले. सोचे लगले कि पंडीजी के कुछुओ करेके पड़ी. ना त हमार रोजिये बन कर दिहे. भूके मरे के अलावे कवनो उपाये ना रही जाइ? ओकरा बादे मोलबी साहेब आपन भेस बद्लिके पहुच गइले. पंडीजी के दवाईखाना, पंडीजी के दवाईखाना के रोगियन के बिच बइठल सोचत रहले कि कइसे आ कवन बेमारी बताइ जवना से पंडीजी के भंडा फुट जाव, आ रोगी त भड्किये जास, आ हमहू पंडीजी से बेमारी ठीक ना कर पावेसे १००० रुपइया झटक लिही. सोचते- सोचते मोलबिओ साहेब के नम्बर आ गइल. पंडीजी, मोलबी साहेब के भेष बदलल देखिके कुछ चिहइले, बाकी जलदिये अपने-आपके सम्हारत, अनजान बनल पुछले, "बताइँ आपन नाँव बताइँ?" 
“रहीम! रहीम नाम ह हमार.” 



बताइँ का भइल बा?”
“अरे का कही बैदजी, बस समझ जाइ कि, एह उमिर में कतही मन लागत नइखे. बेटा पतोह छोड़ के चल गइल बा. केहू-केहू कीहें कइसहू जी लेत बानी. कालहु रातिखानी से हमारा मुँह के स्वाद चली गइल बा. कुछ बुझाते नइखे कि का खात बानी. अइसन कवनो दवाई दिही कि हमारा स्वाद आ जाऊ.” 
“बस अतने, तुरंते ठीक हो जाइ, घबराइ मत.” ओकरा बाद पंडीजी आपन स्टाफ के आवाज़ दिहले, “अरे रामू देख आलमारी के उपरी खाना में पांच नम्बर के शीशी राखाल होइ, एक ठेपी दवाई ढारी के मोलबी साहेब के पीया द.” 
रामू दवाई के शीशी लेले मोलबी साहेब लगे आके मुँह कहि के अउरी मोलबी साहेब के मुह खोललें रामू एक ठोप दवाई मोलबी साहेब के मुँह में ढारी दिहलें. दवाई मुँह में जाते, मोलबी साहेब, ओतने जल्दी दवाई के बाहर फेकत, “इइ का पंडीजी, दवाई के बदले किरासन तेल पिआवत बानी.” 
“ निकाल हमारा फीस, तहार मुंह के स्वाद आ गइल, तहार बेमारी ठीक हो गइल.” 
दवाईखाना में बइठल सभ रोगी पंडीजी के बडाई करे लागल। मोलबी साहेब, आपना के हारल महसूस करत पंडीजी के देखे के फीस २०० रूपया देके चल दिहले. 
फेरु थोड़े दिन बाद मोलबी साहेब पहुच गइले पंडीजी के लगे। पंडीजी मोलबी साहेब के देखते, “ आईं आईं रहीम भाई, कहीं कइसे-कइसे आइल बानी, तबियत त ठीक बा नू”. 
“अरे ना, देखिना आजू सबेर से के जाने का हो गइल बा कि कुछ इयादे नइखे रहत, बुझात बा कि हमार इयादास्त चली गइल बा”. 
“आच्छा, हम काहे खातिर बानी. अबहीएं राउर इयादस्त ले आवत बानी. बइठी.” मोलबी साहेब के बइठावत, रामू के आवाज़ दिहले, अरे रामू, देख पाँच नम्बर के शीशी के दवाई ले आवऽ, एक ठोप मोलबी साहेब के दऽ,” 
“अरे ओह में त किरासन के तेल बा!” 
“निकाल हमार फीस, तहार बेमारी त ठीक हो गइल. तहार इयादस्त आपस आगइल.” 
मोलबी साहेब फेरु से आपना के हारल महसुस कइले आ २०० रुपया निकालि के पंडीजी के फीस देके चली गइले. 
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अब मोलबी साहेब परेसान हो गइले, सोचे लगले कि का करी कइसे रोकी पंडीजी के, उनकर दवाई दूकान त दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ले चलल चल जात बा. बाकी हमहू हार ना मानब पकिया मोलबी बानी,. “देखत बानी कब ले पंडीजी उनकर जाल में नइखन आवत.” 
फेरु मोलबी साहेब पहुच गइले पंडीजी के दवाईखाना में. अबकी हाली मोलबी साहेब आपन आँखी प करिया चस्मा लगवले हाथ में लाठी लेले रहले. मोलबी साहेब के देखते पंडीजी समझ गइले कि इ मोलबी मानेवाला नइखे. कहले कि “रहीम भाई का भइल बाइ?” 
“का कही पंडीजी, कुछुओ नइखे लउकत, अइसन कुछो करी कि जल्दी हमार आंखी ठीक हो जाए.” 
“देखि रहीम भाई, अइसन बा कि हम रउरा से हारी गइनी, हम राउर इलाज ना करी पाइब, इलाज ना कर पावेके दण्ड हमारा से ले लिही, आ दोसरा लगे इलाज करा लिही.” ओकरा बाद पंडीजी रामू के आवाज़ लगवले, 
“अरे रामू देख मोलबी साहेब के १००० रूपया दे दऽ, हम इनकर इलाज ना कर पाइब.” 
रामू पंडीजी के हुकुम आ इसारा पावते १०० के एगो नया नोट निकाल के मोलबी साहेब के हाथ प राखी दिहले. 
मोलबी साहेब आगि बबूला होत रामू प आपन खीझ जाहिर कइले, “इ का? तू १००० के नोट के बदले १०० के नोट देत बाडऽ. इहे तहनी लोग के जुबान बा. परचा में छापवावत कुछ बाड करत कुछ.” 
पंडीजी मोलबी साहेब के समझावत कहेले कि, “पाहिले बइठी, आ बेमारी ठीक होखेके फीस हमार दे दिही, काहे कि राउर बेमारी त ठीक हो गइल, आइल रही त रउरा लउकत ना रहे. आ अब रउरा साफ लउकत बा कि रउरा १००० के ना बल्कि १०० के नोट मिलल बा.” 
एही प कहल गइल बा कि चौबे गइले छब्बे बने, दुबे बनी के आ गइले. 
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लेखक परिचय:-


पत्रकारिता वर्ष १९९० से औरी झारखण्ड सरकार में कार्यरत 
कईगो पत्रिकन में कहानी औरी लेख छपल बा 
संपर्क:- 
हो.न.-३९ डिमना बस्ती 
डिमना रोड मानगो 
पूर्वी सिंघ्भुम जमशेदपुर, झारखण्ड-८३१०१८ 
ई-मेल: kishenjiumesh@gmail.com 
मोबाइल नं:- 9431347437
अंक - 61 (5 जनवरी 2016)

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