संपादकीय

भ्रूण गीत - सुरेश कांटक

कोखिये में तूरि दिहलू, सपना ए माई 
हमहूँ बनितीं बेदी, आ कलपना माई! 
 
कवन कसूर कइनी कइलू तू दूर हो 
केकरा करनिया से, भइलू मजबूर हो
दूर कइलू नेहिया से, अपना ए माई!

अंगे-अंगे कोखिये में, मोर कटववलू 
दया-माया नाहि आइल, नाली में बहवलू 
सीखि लिहलू बेटा-बेटा जपना ए माई! 

होखिती सेयान, सेवा खूब तोहार करितीं 
देखि लिहतीं दुनिया, आ तहरो के तरितीं 
मीटि जाइत हियरा के, तपना ए माई! 

एके कोखी बेटा-बेटी, कइलू तू भेद हो 
हतेया कराइ दिहलू , पढ़लू लबेद हो 
कहियो पछतइबू, डललू ढपना ए माई! 

गतरे-गतर काटि देलस, काटत बाटे मूड़ी 
खूने-खून कइ देलस डाकडर के छूड़ी 
कइसन मशीन आइल नपना ए माई!

दरदे बेकल हम पेटवे में भइनी 
रोवनी कलपनी आ खूबे छपटइनी 
छोड़ि द तू राम नाम जपना ए माई!
------------------------------

लेखक परिचयः

नाम: सुरेश कांटक
ग्राम-पोस्ट: कांट
भाया: ब्रह्मपुर 
जिला: बक्सर 
बिहार - ८०२११२


अंक - 63 (19 जनवरी 2016)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.