संपादकीय

बाड़ी मोरी अबही उमरिया

बाड़ी मोरी अबही उमरिया
आ विधाता दिनवा धई दिहलें ऐ राम...

सजना सेयान हम नदान,
त कइसे के गवनमां जाइब ऐ राम 
बाबा मोरा अइसन निरमोहिया 
न मन में विचरवा कइले ऐ राम
माई मोरा हिया के कठोर
त घरवा से निकाली दिहली ऐ राम....

नइहर में कुछउ न सिखलीं 
पिया के घर का करब ऐ राम 
कुसुम रंग पेन्हली चुनरिया
त लाल रंग चादर मिलल ऐ राम...

डोलिया में हमके बिठाई के
कहार चार लागी गइले ऐ राम 
सुसुकि-सुसुकि माई रोवेली
त सखी फुका फारी रोवे ऐ राम....

धनी अब भइली ससुरइतीन
लउटी फिर न आइब ऐ राम 
दास ऐ कबीर, निर्गुण गावेलन
गाके समझावेले ऐ राम...
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अंक - 60 (29 दिसम्बर 2015)

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