संपादकीय

रामधनी - अक्षय कुमार पांडेय

केतना दिन तक चुप रहब s 
अब बोल s रामधनी ;

तनी मुंह खोल s रामधनी !


तोहसे सपना छीन के 
आपन नींन खरीदत बाटे , 

तोहरो फाटल - कटल हिया पर
नकली पेवन साटे , 
एह समाज के सधल नजर से 
तोल s रामधनी !

तिरिछा कांटा धंसल पांव में
पीर हिया ले जाय , 
दरद उलीचत उमिर ओराइल 
दुख ना कबो ओराय , 
कब ले ठहरल रहब s 
अब कुछ डोल s रामधनी !

मन क s सकुचल आसमान में 
कइसे चान उगी , 
जिनिगी क s मूअल माटी में 
कइसे धान उगी , 
पुलके प्रान , हिया में अमरित 
घोल s रामधनी !

थाकल पानी क s उदास रंग 
असगुन रोज रचे, 
दुख क s कठिन पहाड़ चढ़े भर 
अथक उछाह बचे, 
अलसाइल अंखियन के अब तूं 

धोल s रामधनी !
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- अक्षय कुमार पांडेय











अंक - 59 (22 दिसम्बर 2015)

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