संपादकीय

करे के ना चाहीं - विश्वनाथ प्रसाद 'शैदा'

खुशामद केहू के करे के ना चाहीं
कहीं बात वाजिब डरे के ना चाहीं।

जवन बात सपनो में दे दीं केहू के
त बजरो के परले टरे के ना चाहीं।

रखीं जे अमानत केहू के ऐ ‘शैदा’,
त ताखा दियानत धरे के ना चाहीं।

पसेना के अपना कमाई उड़ाईं,
मगर खेत अनकर चरे के ना चाहीं।

कोई ताल ठोके त ठोकीं, हटीं मत,
मगर धुर में जेवरि बरे के ना चाहीं।

बने के ना चाहीं बेपेनी के लोटा,
कोई काम खोंटा करे के ना चाहीं।

झुलत सुख के झुलुहा प देखी केहू के,
बिना आगि-काठि जरे के ना चाहीं।

बनीं जे खेवइया त मझँधार में फिर,
बुड़ा सभ के अपने तरे के ना चाहीं।

जियल सान से मोल ह जिन्दगी के,
कुकुर अस जिए आ मरे के ना चाहीं।
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- विश्वनाथ प्रसाद 'शैदा'








अंक - 59 (22 दिसम्बर 2015)

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