संपादकीय

जै हो बिछी माई - अभिषेक यादव

हजार झूठ पऽ मारे एक बेर बीछि  डंक
धरमी काम कवन कोताही राजा चाहे रंक।

सच्चाई के आँख जनि देखाईंं सरकार
हमरे लेखा रऊवों के ठोकी चार बार।

देंहे-देंहे बिख भरल बा तहरो से भी जादा
केहू करे चपलूसी केहू करे तगादा।

हवे ई दवाई इहे बात हम जानिले
महादेव के श्रृंगार तू सघरि जमात मानिले।

नेता नगाड़ी झूठ बोलेसन कुछ तऽ कर उपाई
डंक मारिके झूठ भगा दऽ जै हो बिछी माई।  
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- अभिषेक यादव











अंक - 60 (29 दिसम्बर 2015)

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