संपादकीय

एगो ठगिन - अभिषेक यादव

(१) 
जिऩगी के राग जब झर जाइ नेह से
जाउत आ पिया जी जुड़ाय जाले देह से
ओही दिने लेहड़ गाँव के, घाट पऽ ठेकाय दी
बुझिह सुगनवा तोहै, माया से लोकाय दी
(२) 
जहँवा के अंश रहला तहवें के भागी,
भले से अकाज होई सभे आई लांगी,
लोभ-पाप धरम-करम बूड़े उतराए दी
मोह क अहरा धई माया के जराय दी
(३)
माया के न टोना-मोना ओरहन भ गारी
राई-छाइ कुछू ना रुखानी बा दुआरी
लाँगा से न भेंट घाट ना केहू छिछोरा बा
तन-धन करिया नईखे सभे मन क गोरा बा
(४)
भोर भोरहरिया जै! जै! साँझ गदबेरिया जै! जै!
सोम रस पान ढ़रके देवलोक में जै! जै! जै! जै!
माया में मय रहि, इहाँ त जय होई
करम कमाई केतना इहंवे त तय होई
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- अभिषेक यादव












अंक - 58 (15 दिसम्बर 2015)

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