विविध

अब नाहीं - गोरख पाण्डेय

गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले।


झीनी-झीनी बीनीं, चदरिया लहरेले तोहरे कान्‍हे
जब हम तन के परदा माँगी आवे सिपहिया बान्‍हे
सिपहिया से अब नाही बन्‍हइबो, चदरिया हमरा के भावेले।
गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले।

कंकड चुनि-चुनि महल बनवलीं हम भइलीं परदेसी
तोहरे कनुनिया मारल गइलीं कहवों भइल न पेसी
कनुनिया अइसन हम नाहीं मनबो, महलिया हमरा के भावेले।
गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले।

दिनवा खदनिया से सोना निकललीं रतिया लगवलीं अँगूठा
सगरो जिनगिया करजे में डूबलि कइल हिसबवा झूठा
जिनगिया अब हम नाहीं डुबइबो, अछरिया हमरा के भावेले।
गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले।

हमरे जंगरवा के धरती फुलाले फुलवा में खुसबू भरेले
हमके बनुकिया के कइल बेदखली तोहरे मलिकई चलेले
धरतिया अब हम नाहीं गंवइबो, बनुकिया हमरा के भावेले।
गुलमिया अब हम नाही बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले।
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- गोरख पाण्डेय











अंक - 59 (22 दिसम्बर 2015)

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