संपादकीय

मन हमार खुश नईखे - अभिषेक यादव

आजु गाँवे हमरा बाटे पंचाइत,
कि मन हमार खुश नइखे
एगो मेहरी के मरदा बा विलाइत,
कि मन हमार खुश नइखे।

मेहरी के डाह फूँके मरदा कमाई से,
सास-ससुर काटऽतारे दिनवा जम्हाई से
जबकि करेले बूढ़ऊ शिकाइत:
कि मन हमार खुश नइखे।

साज-सिंगार छूटल; छूटल गोड़ रंगाई,
जीव चटकार केसे कही भऽ मंगाई?
ओकर बियाह भइल बाटे बिना साइत:
कि मन हमार खुश नइखे।

मन के भौंरा अब भऽ गइले तितरी,
अनमोल गहना उनका भइल बाड़े पीतरी
अउरी करेले बुढ़िया फेंकाइत:
कि मन हमार खुश नइखे।

रहे के न जाने के झट से पराय गइले,
अनबोल बूझी उनका खूँटा पऽ धराई गइले
हमरा लागेला मउगी बिया राईट:
कि मन हमार खुश नइखे।

आजु गाँवे हमरा बाटे पंचाइत,
कि मन हमार खुश नइखे।
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अंक - 52 ( 3 नवम्बर 2015)

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